मध्यपूर्व में जंग तेज कूटनीति ठप, ईरान पर वैश्विक चिंता बढ़ी
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मध्यपूर्व में जंग तेज कूटनीति ठप, ईरान पर वैश्विक चिंता बढ़ी

अमेरिका-इज़राइल-ईरान युद्ध में बातचीत टूटने से संकट गहरा गया है, कूटनीति विफल दिख रही है और वैश्विक असर के बीच समाधान की उम्मीद कम होती जा रही है।


अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी युद्ध जैसे-जैसे लंबा खिंचता जा रहा है, वैश्विक स्तर पर इसके गंभीर असर दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में किसी समझौते की संभावना लगातार कमजोर होती जा रही है। बातचीत के बीच ही वार्ता का टूट जाना कई लोगों को चौंकाने वाला लगा है और इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान पर सैन्य हमला पहले से तय था, न कि कूटनीति की विफलता।

The Federal के यूट्यूब शो Worldly Wise में बातचीत के दौरान अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ KS Dakshina Murthy ने विस्तार से बताया कि कूटनीति क्यों विफल हुई और क्या अब भी मध्यस्थता की कोई संभावना बची है।

बातचीत के बीच हमला: कूटनीति क्यों टूटी?

युद्ध से पहले अमेरिका और ईरान के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी थी और ऐसा लग रहा था कि कोई समझौता हो सकता है। लेकिन इज़राइल का लंबे समय से ईरान पर सैन्य हमला करने का एजेंडा रहा है और डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका अक्सर बेंजामिन नेतनयाहू के साथ कदम मिलाकर चलता रहा है। दुनिया, खासकर ईरान, उस समय हैरान रह गई जब बातचीत जारी रहने और अंतिम चरण के लिए जिनेवा शिफ्ट होने की तैयारी के बीच ही अमेरिका ने हमला कर दिया, जिसके बाद इज़राइल ने भी कार्रवाई की।

अमेरिका का कहना है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने को तैयार नहीं था, इसलिए यह कदम उठाया गया। लेकिन बातचीत के दौरान हमला होना ही सबसे बड़ा विवाद बन गया है।

वैश्विक असर और बढ़ता संकट

करीब 20 दिन से जारी इस संघर्ष ने वैश्विक स्तर पर असर डाला है। गैस क्षेत्रों पर हमले हुए हैं, क्षेत्रीय विमानन उद्योग लगभग ठप हो गया है और इसके प्रभाव पूरी दुनिया में फैल रहे हैं। ऐसे में दुनिया के लिए किसी समझौते तक पहुंचना बेहद जरूरी है, लेकिन जिस तरह यह युद्ध शुरू हुआ, उससे मध्यस्थता की कोशिशें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं और सभी पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं।

ईरान की शर्तें: मांग या रणनीति?

ईरान ने बातचीत के लिए तीन मुख्य शर्तें रखी हैं—

युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई (reparations)

भविष्य में हमले न होने की सुरक्षा गारंटी

अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने का अधिकार

ईरान का कहना है कि यह युद्ध अवैध है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इसे मंजूरी नहीं दी थी और उसने किसी पर सीधा हमला भी नहीं किया था। अमेरिका इसे संभावित खतरे के आधार पर पूर्व-खतरनाक कार्रवाई (preemptive strike) बता रहा है, लेकिन इसके समर्थन में ठोस सबूत सामने नहीं आए हैं।

मध्यस्थता की कमी: कौन करेगा पहल?

इस संघर्ष में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मध्यस्थता कौन करेगा। ईरान के करीब है और मजबूत वैश्विक शक्ति भी है, लेकिन उसने सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। रूस भी प्रभावी भूमिका निभा सकता था, लेकिन वह रूस-यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है। खाड़ी देश कतर, यूएई, सऊदी अरब और ओमान—सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, लेकिन अमेरिका के साथ उनके करीबी संबंध उन्हें खुलकर दबाव बनाने से रोकते हैं। भारत के पास दोनों पक्षों से अच्छे संबंध हैं, लेकिन इज़राइल के पक्ष में झुकाव के कारण उसकी विश्वसनीयता कम हुई है। यूरोपीय देश भी ठोस पहल नहीं कर पाए हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिकी वीटो के कारण निष्क्रिय नजर आ रहा है।

बढ़ता खतरा: बातचीत या विस्तार?

अमेरिका और इज़राइल ने अब तक ईरान की शर्तों पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी है। इसके उलट, वे ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने की बात कर रहे हैं। यहां तक कि अमेरिका और होर्मुज स्ट्रेट के पास 2,000 से 5,000 मरीन तैनात करने की चर्चा भी हो रही है, जिससे संकेत मिलता है कि संघर्ष और बढ़ सकता है।

मौजूदा स्थिति में यह साफ है कि कूटनीति लगभग ठप हो चुकी है और कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है। दुनिया इस संघर्ष को देख तो रही है, लेकिन प्रभावी हस्तक्षेप करने में असमर्थ नजर आ रही है।आखिरकार, इस संकट को सुलझाने की जिम्मेदारी पश्चिम एशियाई देशों पर ही आकर टिकती है। यदि वे आगे नहीं आए, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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