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ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की इनसाइड स्टोरी, कौन हैं इसके चेहरे और क्यों हो रहा विरोध?

Davos Conference: बोर्ड का चार्टर तब लागू होगा, जब कम से कम तीन देश इसे औपचारिक रूप से स्वीकार कर लेंगे। सदस्यता का कार्यकाल तीन साल का होगा।


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Donald Trump Board of Peace: दावोस की बर्फीली वादियों में जब दुनिया के सबसे ताकतवर नेता अर्थव्यवस्था पर चर्चा कर रहे थे, उसी मंच से डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा ऐलान कर दिया, जिसने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी। ‘शांति’ के नाम पर बना 'बोर्ड ऑफ पीस' एक ऐसा मंच, जिसकी कमान खुद ट्रंप के हाथ में होगी, वो भी आजीवन। सवाल यही है कि क्या यह दुनिया में शांति लाने की कोशिश है या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नई दिशा में मोड़ने की तैयारी?

ट्रंप का कहना है कि यह बोर्ड दुनिया में चल रहे बड़े संघर्षों को सुलझाने में मदद करेगा। हालांकि, कई देशों और नेताओं ने इस बोर्ड की भूमिका को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है। डोनाल्ड ट्रंप ने साफ किया कि वे खुद इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे। खास बात यह है कि यह पद उनके राष्ट्रपति कार्यकाल से जुड़ा नहीं होगा। यानी राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष बने रहेंगे। ट्रंप ने कहा कि जब यह बोर्ड पूरी तरह बन जाएगा, तब हम लगभग हर वह काम कर पाएंगे जो हम चाहते हैं। हम संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर काम करेंगे।

संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब आलोचकों का कहना है कि यह बोर्ड कहीं न कहीं संयुक्त राष्ट्र (UN) की कुछ भूमिकाओं की जगह लेने की कोशिश लग रहा है। इसी वजह से कई देश इसे लेकर सतर्क हैं।

गाजा योजना से शुरू हुआ विचार

इस बोर्ड का विचार सबसे पहले गाजा के लिए ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना के तहत सामने आया था। लेकिन अब अमेरिका इसे सिर्फ गाजा तक सीमित न रखकर एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में पेश कर रहा है, जो भविष्य में दूसरे संघर्षों को भी सुलझाएगा।

सदस्य बनने की बड़ी कीमत

‘बोर्ड ऑफ पीस’ की स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक अरब डॉलर (करीब 8,000 करोड़ रुपये) का शुल्क तय किया गया है। स्थायी सदस्यता तीन साल के कार्यकाल के बाद भी बनी रहेगी, जबकि सामान्य सदस्यता को हर तीन साल में नवीनीकरण करना होगा।

कौन-कौन से देश जुड़ने को तैयार?

अब तक जिन देशों ने बोर्ड में शामिल होने की इच्छा जताई है, उनमें इजराइल, सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया और पाकिस्तान शामिल हैं। हालांकि, अमेरिका को छोड़कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई भी स्थायी सदस्य अभी तक इसमें शामिल नहीं हुआ है।

दावोस में जुटे कई बड़े नेता

दावोस में बोर्ड ऑफ पीस से जुड़े कई बड़े नेता एक साथ नजर आए। इनमें अल्बानिया के प्रधानमंत्री एडी रामा, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल रहमान, कज़ाखस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोमार्त तोकायेव, पराग्वे के राष्ट्रपति सैंटियागो पेना और उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ीयोयेव शामिल हैं। इसके अलावा वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव टो लाम ने भी इस बोर्ड को स्वीकार करने की बात कही है। वहीं, बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको ने कहा है कि वे इसमें हिस्सा लेने को तैयार हैं।

एग्जीक्यूटिव बोर्ड

इस बोर्ड की कार्यकारी समिति (एग्ज़ीक्यूटिव बोर्ड) में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर शामिल हैं। टोनी ब्लेयर वही नेता हैं, जिन्होंने 2003 में अमेरिका के साथ मिलकर इराक युद्ध में ब्रिटिश सेना भेजी थी। इसके अलावा ट्रंप के दामाद जैरेड कुशनर भी इस बोर्ड का हिस्सा हैं। हालांकि, इस बोर्ड में कोई भी फ़लस्तीनी प्रतिनिधि शामिल नहीं है, जिसे लेकर आलोचना हो रही है।

कनाडा को दिया गया न्योता वापस

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पहले सैद्धांतिक रूप से बोर्ड में शामिल होने की सहमति दी थी। लेकिन बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को भेजा गया न्योता वापस ले लिया। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि कनाडा को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का न्योता वापस लिया जा रहा है।

किन देशों ने बनाई दूरी?

कई बड़े यूरोपीय देशों ने इस बोर्ड में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इनमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और स्लोवेनिया शामिल हैं। ब्रिटेन की विदेश मंत्री यवेट कूपर ने कहा कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की संभावित भूमिका को लेकर चिंता है, इसलिए ब्रिटेन फिलहाल इस बोर्ड से दूर रहेगा। स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट गोलोब ने कहा कि यह पहल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में खतरनाक दखल जैसी है।

बोर्ड में शामिल होने के नियम

लीक हुए चार्टर के मुताबिक, बोर्ड का चार्टर तब लागू होगा, जब कम से कम तीन देश इसे औपचारिक रूप से स्वीकार कर लेंगे। सदस्यता का कार्यकाल तीन साल का होगा। एक अरब डॉलर देने वाले देशों को स्थायी सदस्यता मिलेगी। इस पैसे का इस्तेमाल गाजा के पुनर्निर्माण में किया जाएगा।

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