क्या ईरान युद्ध में अकेला पड़ रहा अमेरिका? पीछे हटे यूरोपीय देश
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क्या ईरान युद्ध में अकेला पड़ रहा अमेरिका? पीछे हटे यूरोपीय देश

ईरान युद्ध लंबा खिंचने से अमेरिका पर दबाव बढ़ गया है। यूरोपीय देश अब पीछे हट रहे हैं, जिससे डोनाल्ड ट्रंप की वैश्विक स्थिति कमजोर दिख रही है।


ईरान के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में शुरू हुई सैन्य कार्रवाई अब उम्मीद से ज्यादा लंबी खिंचती दिख रही है। शुरुआत में जहां अमेरिका को अपने प्रमुख सहयोगियों का समर्थन मिला था, वहीं अब वैश्विक प्रतिक्रिया बदलती नजर आ रही है। कई देश अब हिचकिचाहट, अस्पष्टता और यहां तक कि विरोध का संकेत दे रहे हैं।पूर्व अमेरिकी राजदूत मीरा शंकर ने इस बदलते वैश्विक रुख पर विस्तार से अपनी राय दी और बताया कि कैसे बड़े देश अपनी रणनीतियों को फिर से तय कर रहे हैं।

क्या ट्रंप हो रहे हैं अलग-थलग?

मीरा शंकर के अनुसार, शुरुआत में यूरोपीय देशों ने अमेरिका के सैन्य अभियान का समर्थन किया था और कहा था कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जा सकते। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि शुरुआती सैन्य कार्रवाई और ईरानी नेताओं की हत्या से कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव नहीं आया और युद्ध लंबा खिंच सकता है, तब यूरोपीय देशों में चिंता बढ़ने लगी।अब कई यूरोपीय देश इस युद्ध को लेकर संदेह जता रहे हैं और खुलकर समर्थन देने से बच रहे हैं।


होर्मुज़ संकट पर ठंडा रुख

अमेरिका ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए सहयोगी देशों से नौसेना गठबंधन बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन इस पर प्रतिक्रिया काफी ठंडी रही।Spain ने तो साफ तौर पर इस युद्ध का विरोध किया और कहा कि वह यूक्रेन, गाजा या ईरान—किसी भी जगह सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ है। वहीं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री Keir Starmer ने संकेत दिया कि उनका देश इस संघर्ष को और व्यापक रूप नहीं देना चाहता।Germany ने भी कहा कि इस युद्ध को न तो संयुक्त राष्ट्र और न ही NATO की मंजूरी मिली है, और उन्हें इस फैसले में शामिल भी नहीं किया गया।

कूटनीतिक समाधान की कोशिश

यूरोपीय आयोग इस बात की संभावनाएं तलाश रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र के जरिए ईरान के साथ कोई समझौता किया जा सकता है, जैसा कि यूक्रेन अनाज समझौते में हुआ था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह प्रयास कितना सफल होगा, क्योंकि ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को एक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

सहयोगियों की हिचकिचाहट क्यों?

यूरोपीय देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस युद्ध का कोई स्पष्ट अंत नजर नहीं आ रहा। उन्हें डर है कि वे एक लंबे और अनिश्चित संघर्ष में फंस सकते हैं।दूसरी चिंता यूक्रेन युद्ध को लेकर है। अमेरिका द्वारा अपनी सैन्य और आर्थिक मदद कम करने के बाद यूरोप को अधिक जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है। ऐसे में अगर ध्यान ईरान की ओर चला जाता है, तो यूक्रेन की स्थिति और खराब हो सकती है।इसके अलावा ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील जैसे मुद्दे भी यूरोप को चिंतित कर रहे हैं।

क्या बदल रही है वैश्विक राजनीति?

मीरा शंकर के अनुसार, Donald Trump की नीतियों ने पारंपरिक वैश्विक राजनीति को बदल दिया है। वे अब बड़े देशों जैसे चीन और रूस के साथ समझौते करने और प्रभाव क्षेत्रों को लेकर नए समीकरण बनाने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

चीन के साथ पहले उन्होंने भारी टैरिफ लगाए थे, लेकिन बाद में दुर्लभ खनिजों में चीन की पकड़ के कारण उन्हें नरम रुख अपनाना पड़ा। अब अमेरिका चीन के साथ संतुलित संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है।रूस के साथ भी रिश्ते सुधारने के संकेत मिल रहे हैं। ट्रंप ने यहां तक कहा है कि यूक्रेन युद्ध टाला जा सकता था और अब वे अधिक व्यावहारिक संबंध चाहते हैं।

क्या भरोसे का संकट है असली वजह?

मीरा शंकर का मानना है कि सबसे बड़ा मुद्दा भरोसे का है। चीन और रूस जैसे देश व्यावहारिक राजनीति (realpolitik) के आधार पर फैसले लेते हैं, लेकिन अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी जैसे यूरोप और कनाडा ट्रंप की नीतियों से असहज हैं।ट्रंप द्वारा सहयोगी देशों की आलोचना और सख्त कदमों ने उनके साथ भरोसे की कमी पैदा कर दी है।

‘मिडल पावर्स’ का उभरता गठजोड़

इस स्थिति के चलते कुछ देश अब “मिडल पावर्स” का एक नया समूह बनाने की बात कर रहे हैं, ताकि वे बड़ी शक्तियों पर निर्भर हुए बिना अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर सकें।ईरान युद्ध ने न केवल पश्चिमी गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। सहयोगियों की हिचकिचाहट और भरोसे की कमी के बीच यह देखना अहम होगा कि अमेरिका इस स्थिति से कैसे निपटता है और क्या वह अपने पुराने सहयोगियों का भरोसा फिर से जीत पाता है।

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