
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 24 फरवरी को अपने 'स्टेट ऑफ द यूनियन 2026' भाषण में कई बड़े दावे किए। लेकिन अब इन दावों की सच्चाई पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
एक चुनावी भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कहा था कि राजा पुरुषोत्तम (पोरस) ने सिकंदर महान को बिहार में हराया था। यदि किसी को भारत के प्रधानमंत्री के इस बयान पर हंसी आई हो या बुरा लगा हो, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मंगलवार (24 फरवरी) का 'स्टेट ऑफ द यूनियन' भाषण सुनने के बाद तो उसे कछुए की तरह अपने खोल में ही छिप जाना चाहिए। ट्रंप ने बार-बार, आत्मविश्वास से और बढ़ा-चढ़ाकर झूठ बोला। उन्होंने महंगाई, रोजगार, आर्थिक विकास, अपने टैरिफ के भुगतान का जिम्मेदार कौन है, अपराध आंकड़े, स्वास्थ्य सेवा की लागत, अपने पूर्ववर्तियों का रिकॉर्ड, आप्रवास, भ्रष्टाचार और अप्रवासियों द्वारा ठगी, और डेमोक्रेट्स के अमेरिका के प्रति रुख के बारे में झूठ बोला।
भारत और पाकिस्तान पर अजीब दावा
भारतीयों के लिए चिंता की बात यह है कि ट्रंप ने ईरान के लिए अपनी योजनाओं को स्पष्ट करने से इनकार कर दिया। साथ ही, भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध को टालने के उनके दावे ने लोगों को हैरान कर दिया है। ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने ऐसे युद्ध में 3.5 करोड़ लोगों को मरने से बचाया। उन्होंने यह आंकड़ा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के नाम मढ़ दिया, जबकि इसकी सच्चाई की पुष्टि होने की संभावना बहुत कम है।
भारत की बढ़ी चिंता
ईरान को लेकर अनिश्चितता बेवजह तेल की कीमतें बढ़ा रही है और उस क्षेत्र में रहने वाले लाखों लोगों, जिसमें भारतीय प्रवासी श्रमिक भी शामिल हैं, की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा रही है। अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है और क्षेत्र में युद्ध छिड़ता है, तो कुछ अस्थायी भारतीय प्रवासियों को इजराइल से जल्दी वापस लौटना पड़ सकता है।
नस्लीय राजनीति और ट्रंप का आधार
ट्रंप ने बिना सीधे कहे यह संकेत दिया कि उन्होंने एक 'कन्फेडरेट' (गुलामी का समर्थन करने वाले) सैन्य नेता के नाम पर रखे गए 'फोर्ट ब्रैग' का नाम बहाल कर दिया है। 2023 में इसका नाम बदलकर 'फोर्ट लिबर्टी' किया गया था। युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने इसे वापस 'फोर्ट ब्रैग' कर दिया, लेकिन इस बार इसे दूसरे विश्व युद्ध के नायक 'रोलैंड ए. ब्रैग' के नाम पर रखा गया। यह रणनीति उस जनरल ब्रैक्सटन ब्रैग से बचने के लिए अपनाई गई थी जिसने गुलामी की रक्षा के लिए युद्ध लड़ा था।
2020 में जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या और 'ब्लैक लाइव्स मैटर' विरोध प्रदर्शनों के बाद, गुलामी का समर्थन करने वाले योद्धाओं के स्मारकों को हटा दिया गया था। इससे ट्रंप का 'श्वेत वर्चस्ववादी' (White Supremacist) समर्थक वर्ग काफी नाराज था। नॉर्थ कैरोलिना के इस मिलिट्री बेस का नाम फिर से 'ब्रैग' रखकर ट्रंप ने उन समर्थकों को खुश करने की कोशिश की है। ट्रंप ने तर्क दिया कि अमेरिका ने इसी नाम के साथ प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध जीते थे, लेकिन उन्होंने उस चतुराई को नजरअंदाज कर दिया जिसके जरिए इस विवादित नाम को वापस लाया गया।
ट्रंप का टैरिफ झूठ
इस समय फेडएक्स (FedEx), कॉस्टको (Costco), रेवलॉन (Revlon) और हजारों अन्य कंपनियां ट्रंप प्रशासन पर मुकदमा कर रही हैं। इन कंपनियों की मांग है कि सामानों पर जो 'टैरिफ' (आयात शुल्क) उन्होंने चुकाया है, उसका पैसा उन्हें वापस मिले। इसके बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति बिना किसी हिचकिचाहट के यह झूठ दोहरा रहे हैं कि यह शुल्क विदेशी देशों ने भरा है, जिससे अमेरिकी खजाना भरा है। असलियत यह है कि यदि कंपनियों को यह पैसा वापस करना पड़ा, तो अमेरिका को भारी राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) का सामना करना पड़ सकता है।
निवेश के आंकड़ों में बड़ी गड़बड़ी
ट्रंप का दावा है कि उन्होंने अपने पहले ही साल में अमेरिका में 18 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हासिल किया है। हालांकि, व्हाइट हाउस का अपना 'इन्वेस्टमेंट ट्रैकर' केवल 9.7 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा ही दिखाता है। 9.7 ट्रिलियन से सीधा 18 ट्रिलियन तक पहुँच जाना सिर्फ एक कोरी कल्पना ही कही जा सकती है। व्हाइट हाउस का अपना आंकड़ा भी निवेश के धुंधले वादों और अमेरिकी सामान खरीदने के आश्वासनों का एक घालमेल है।
खाड़ी देशों के वादे और जमीनी हकीकत
यूएई (UAE) द्वारा 1.4 ट्रिलियन डॉलर और कतर द्वारा 1.2 ट्रिलियन डॉलर के निवेश के वादे सुनने में तो प्रभावशाली लगते हैं, लेकिन ये पूरी तरह से अवास्तविक हैं। यूएई के पास कुल जमा पूंजी (Sovereign Wealth Funds) लगभग 2.4 ट्रिलियन डॉलर है। यह उम्मीद करना कि वहां के शेख अपना सब कुछ बेचकर अमेरिका में नया निवेश करेंगे, बेवकूफी भरा विचार है। लेखक के अनुसार, इस तरह की उम्मीद करना क्षेत्रीय धार्मिक कैलेंडरों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द "लूनर" (चंद्र) और "लूनेटिक" (पागलपन) के बीच भ्रम पालने जैसा है।
ट्रंप के 'टैरिफ नखरों' और उससे पैदा हुई अनिश्चितता के बावजूद, अमेरिकी अर्थव्यवस्था अधिकांश अन्य अमीर देशों की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। आखिर ऐसा कैसे हो रहा है?
सर्विस सेक्टर बनाम मैन्युफैक्चरिंग
इसका एक संभावित कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था का ढांचा है। अमेरिका की जीडीपी (GDP) में मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) का हिस्सा केवल 11-13 प्रतिशत है। ट्रंप के टैरिफ केवल 'सामानों' (Goods) पर हैं, सेवाओं पर नहीं। जबकि अमेरिका के कुल आर्थिक उत्पादन में सर्विसेज (सेवाओं) का हिस्सा 80 प्रतिशत से भी अधिक है। खेती का योगदान 1 प्रतिशत से भी कम है (हालांकि कृषि से जुड़े सभी क्षेत्रों को मिला दें तो यह 6 प्रतिशत बैठता है)। यही कारण है कि सामानों पर लगे टैक्स का पूरी अर्थव्यवस्था पर उतना बुरा असर नहीं पड़ रहा।
AI: भविष्य की बड़ी उम्मीद
आज अमेरिका के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एक 'बड़ी उम्मीद' बनकर उभरा है। कई टेक दिग्गज कंपनियां एक-दूसरे से आगे निकलने और सबसे पहले 'आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस' (AGI) बनाने के लिए अरबों का निवेश कर रही हैं। वे विशाल डेटा सेंटर और उन्हें चलाने के लिए पावर प्लांट लगा रहे हैं।
चिप निर्माण में बढ़ता निवेश
बाइडन काल की औद्योगिक नीति, जिसका मकसद अमेरिका में ही उन्नत चिप्स बनाना था, अब रंग ला रही है। ताइवान की दिग्गज चिप कंपनी TSMC ने एरिजोना में तीन प्लांट में निवेश किया है और तीन और प्लांट के साथ-साथ एक रिसर्च सेंटर बनाने की भी उसकी योजना है। यही तकनीकी निवेश अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है।
महंगाई और खर्च की समस्या
एक तरफ जहां टैरिफ की अनिश्चितता के कारण मैन्युफैक्चरिंग (निर्माण) क्षेत्र में निवेश डगमगा सकता है, वहीं दूसरी ओर सर्विस सेक्टर और हाउसिंग सेक्टर (जो इस समय काफी चर्चा में है) में निवेश लगातार जारी है। लेकिन ट्रंप की इन आर्थिक नीतियों का एक स्याह पहलू भी है। तथ्य यह है कि इन भारी-भरकम टैरिफों से न तो अमेरिका का 'व्यापार घाटा' (Trade Deficit) कम हुआ है और न ही देश की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में कोई बहुत बड़ी बढ़ोत्तरी हुई है। इन टैरिफों का सबसे बड़ा और मुख्य असर "अफोर्डेबिलिटी क्राइसिस" यानी किफायती संकट के रूप में सामने आया है। इसने अमेरिका के आम नागरिकों के लिए रोजमर्रा की चीजों को महंगा बना दिया है।
डेमोक्रेट्स के लिए चुनावी अवसर
आम जनता की यह परेशानी अब विपक्षी 'डेमोक्रेटिक पार्टी' के लिए एक बड़ा हथियार बन गई है। वे इसे आगामी मिड-टर्म चुनाव (मध्यावधि चुनाव) में एक मुख्य कैंपेन मुद्दे के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में हैं। निश्चित रूप से, यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे स्वीकार करना ट्रंप के लिए बेहद मुश्किल होगा।
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