बदलते बयानों से घिरा अमेरिका, ईरान संघर्ष में ट्रंप की रणनीति पर सवाल
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बदलते बयानों से घिरा अमेरिका, ईरान संघर्ष में ट्रंप की रणनीति पर सवाल

डोनाल्ड ट्रंप के बदलते बयानों ने अमेरिका की रणनीतिक कमजोरी उजागर हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका अब ईरान युद्ध से निकलने का रास्ता तलाश रहा है।


पिछले एक महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख लगातार बदलता नजर आया है। एक ओर वे ईरान को “पूरी तरह तबाह” करने की धमकी देते हैं, तो दूसरी ओर संघर्ष खत्म करने की बात भी करते हैं, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। इस पर ‘द फेडरल’ ने रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. वाएल अव्वाद और पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत से बातचीत की, जिन्होंने अमेरिकी रणनीति और इस बदलते संघर्ष पर अपने अलग-अलग लेकिन कुछ हद तक मिलते-जुलते विचार रखे।

बदलते बयान और रणनीति

ट्रंप के बयान एक पैटर्न का हिस्सा लगते हैं—सुबह सख्ती और शाम को नरमी। उन्होंने ईरान के नेतृत्व, तेल ठिकानों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाने की बात कही, वहीं वापसी के संकेत भी दिए। डॉ. अव्वाद ने इसे अस्थिर और अव्यवस्थित बताया। उनके अनुसार, इससे अमेरिका की वैश्विक छवि कमजोर हुई है और वह अविश्वसनीय नजर आता है।

वहीं अनिल त्रिगुणायत ने इसे आंशिक भ्रम और मजबूरी का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि ट्रंप लगातार अपने बयान और लक्ष्य बदलते रहे हैं, खासकर इसलिए क्योंकि युद्ध उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक आगे नहीं बढ़ा।

युद्ध की गलत गणना

दोनों विशेषज्ञों ने माना कि युद्ध की शुरुआत में गलत आकलन हुआ। डॉ. अव्वाद के अनुसार, ट्रंप को लगा था कि ईरान को कुछ ही दिनों में काबू किया जा सकता है, लेकिन ईरान की जवाबी क्षमता ने अमेरिका को चौंका दिया। क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमले और वैश्विक तेल आपूर्ति में बाधा ने वाशिंगटन पर रणनीति बदलने का दबाव बनाया।

त्रिगुणायत ने भी कहा कि अमेरिका बिना ठोस रणनीति या एग्जिट प्लान के इस युद्ध में उतरा। शुरुआती हमलों के बावजूद ईरान की प्रतिरोध क्षमता को तोड़ा नहीं जा सका।

इजरायल की भूमिका

दोनों विश्लेषणों में इजरायल की भूमिका अहम रही। डॉ. अव्वाद का मानना है कि इजरायल लंबे समय से अमेरिका को ईरान के खिलाफ सीधे टकराव में लाना चाहता रहा है। उनके मुताबिक, जब भी अमेरिका पीछे हटने के संकेत देता है, इजरायल ऐसे कदम उठाता है जिससे तनाव बना रहे।

त्रिगुणायत ने भी कहा कि इस संघर्ष में सिर्फ दो नहीं, बल्कि तीन पक्ष शामिल हैं और इजरायल का उद्देश्य सबसे स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि इजरायल लगातार अमेरिका को और आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रेरित करता रहा है।

बाजार और आर्थिक पहलू

डॉ. अव्वाद ने ट्रंप के बयानों के पीछे संभावित आर्थिक हितों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के बयानों से बाजार में उतार-चढ़ाव आता है, जिसका फायदा कुछ बड़े कारोबारी समूहों को हो सकता है।

त्रिगुणायत ने माना कि ट्रंप के बयानों से बाजार प्रभावित हुए हैं। जब भी तनाव कम होने के संकेत मिले, बाजार स्थिर हुआ और इससे कुछ व्यावसायिक हितों को लाभ हो सकता है।

कूटनीति में बाधा

त्रिगुणायत ने कहा कि इस युद्ध ने अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत को नुकसान पहुंचाया है। कई दौर की बातचीत लगभग समझौते के करीब पहुंच गई थी, लेकिन सैन्य कार्रवाई ने भरोसे को तोड़ दिया।डॉ. अव्वाद ने कहा कि अब अमेरिका का रुख बातचीत से ज्यादा शर्तें थोपने वाला नजर आता है, जिससे शांति की संभावना और जटिल हो गई है।

एग्जिट की तलाश

दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप अब इस संघर्ष से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। डॉ. अव्वाद ने कहा कि ट्रंप समय खरीदने की कोशिश कर रहे हैं और बार-बार समयसीमा बढ़ाना उनकी हिचकिचाहट को दिखाता है।त्रिगुणायत के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी और घरेलू असंतोष के चलते ट्रंप अंततः युद्ध खत्म करने का फैसला ले सकते हैं।

आगे के संभावित हालात

विशेषज्ञों के अनुसार, आगे दो संभावनाएं हैं—या तो अमेरिका पीछे हटेगा और संघर्ष खत्म होगा, या यह और फैलकर बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।त्रिगुणायत ने चेतावनी दी कि यदि तनाव बढ़ा, तो यह पश्चिम एशिया में लंबे समय तक अस्थिरता और गुरिल्ला युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। डॉ. अव्वाद का कहना है कि ईरान आसानी से हार नहीं मानेगा और लंबे समय तक संघर्ष जारी रख सकता है।

क्षेत्रीय असर

इस युद्ध का असर अब पूरे क्षेत्र में दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुए हैं और कई क्षेत्रीय देश भी इस तनाव में खिंचते जा रहे हैं।

डॉ. अव्वाद ने कहा कि भले ही कुछ क्षेत्रों जैसे तेल और हथियार उद्योग को फायदा हो, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को हो रहा है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि इस संघर्ष से क्षेत्र में अस्थिरता, आर्थिक दबाव और अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है।

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