सम्मान से संघर्ष तक, श्रीलंका के पूर्व गुरिल्लाओं की कड़वी सच्चाई
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सम्मान से संघर्ष तक, श्रीलंका के पूर्व गुरिल्लाओं की कड़वी सच्चाई

श्रीलंका में पूर्व LTTE लड़ाके युद्ध के बाद गरीबी, कर्ज, सामाजिक अपमान और बेरोजगारी से जूझते हुए रोज़मर्रा की जिंदगी में संघर्ष कर रहे हैं।


श्रीलंका के किलिनोच्ची शहर में 44 वर्षीय इसाई अमुदन एक ऑटो-रिक्शा चलाकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। कभी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के गुरिल्ला लड़ाके रहे अमुदन ने संघर्ष के दौरान अपना दाहिना पैर खो दिया था और अब जयपुर फुट (कृत्रिम पैर) के सहारे चलते हैं। लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा दर्द शारीरिक तकलीफ से नहीं, बल्कि अपने वर्तमान जीवन से होता है।

अमुदन जैसे कई पूर्व LTTE लड़ाके, जो अब श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में बस चुके हैं, हर दिन कर्ज चुकाने और परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। एक दिन भी काम से छुट्टी लेना उनके लिए चिंता का कारण बन जाता है। वह अक्सर सोचते हैं कि क्या इसी जिंदगी के लिए उन्होंने 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़कर तमिल टाइगर्स का साथ दिया था, एक स्वतंत्र तमिल राज्य बनाने के सपने के साथ।

“हमारी जिंदगी एक अंतहीन संघर्ष है,” अमुदन फोन पर बातचीत में कहते हैं। उनकी आवाज में दर्द और मानसिक तनाव साफ झलकता है। 2009 में जब LTTE को सैन्य रूप से पराजित किया गया, तब अमुदन ने आत्मसमर्पण कर दिया था। इससे पहले वह सिर और कमर में गंभीर चोटें झेल चुके थे और एक पैर गंवा चुके थे, जिसके कारण अब वह भारी शारीरिक काम नहीं कर पाते।

तीन साल जेल में बिताने के बाद उन्हें ‘पुनर्वासित’ घोषित किया गया, लेकिन जीवन आसान नहीं हुआ। मधुमेह से पीड़ित अमुदन को 2014 में कृत्रिम पैर मिलने के बाद भी नौकरी नहीं मिल सकी, क्योंकि उन्होंने स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं की थी। अंततः उन्होंने कर्ज लेकर ऑटो-रिक्शा किराए पर लिया।

अमुदन को हर महीने लगभग 30,000 रुपये कर्ज की किस्त चुकानी पड़ती है। उनके परिवार में उनकी पत्नी—जो खुद भी पूर्व LTTE लड़ाकू हैं—और एक स्कूली बेटा शामिल हैं। 2022 से जारी आर्थिक संकट के चलते उनकी कमाई का अधिकांश हिस्सा कर्ज और जरूरी खर्चों में ही खत्म हो जाता है।

“हम इस कठिन जीवन के आदी हो चुके हैं,” वह कहते हैं, “लेकिन सबसे ज्यादा दर्द इस बात का है कि तमिल समाज हमें भूल चुका है और कई बार हमें तानों का सामना करना पड़ता है।”

हजारों पूर्व लड़ाकों की एक जैसी कहानी

अमुदन की कहानी अकेली नहीं है। श्रीलंका के तमिल बहुल इलाकों में हजारों पूर्व लड़ाके आज ऐसी ही कठिन जिंदगी जी रहे हैं। कभी अलगाववादी संघर्ष में शामिल ये लोग अब अपने सपनों से कोसों दूर हैं।रंगन नाम का एक अन्य पूर्व लड़ाका, जिसने हाल ही में किलिनोच्ची में केरोसिन और इंजन ऑयल बेचना शुरू किया है, भी ऐसी ही कठिनाइयों से जूझ रहा है। 55 वर्षीय रंगन ने LTTE के साथ दो दशक बिताए और कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया। 2009 में आत्मसमर्पण के बाद उसने 63 महीने जेल में बिताए।

रिहाई के बाद भी उसे शांति नहीं मिली। वह आरोप लगाता है कि कुछ साल तक खुफिया एजेंसियों ने उसे लगातार परेशान किया। संघर्ष के दौरान उसकी पहली पत्नी की मौत हो गई थी। उसके शरीर में अब भी धातु के टुकड़े (शरापनेल) फंसे हैं, जिससे उसे अक्सर तेज सिरदर्द और शारीरिक तकलीफ होती है।“मैं 2009 में आत्मसमर्पण के साथ ही ‘मर’ गया था,” वह कहते हैं। “अब मैं हर दिन मरता हूं, क्योंकि लोग हमें हारे हुए के रूप में देखते हैं।”

सम्मान और रोजगार की कमी

2009 में लगभग 12,000 LTTE लड़ाकों ने आत्मसमर्पण किया था। इनमें से अधिकांश ने कम उम्र में ही पढ़ाई छोड़ दी थी, जिससे उनके पास कोई पेशेवर कौशल नहीं है। यही कारण है कि आज उन्हें सम्मानजनक नौकरी नहीं मिलती और उन्हें मजबूरी में छोटे-मोटे काम करने पड़ते हैं।रंगन बताते हैं कि कई बार उनके परिवार को सिर्फ चावल, मट्ठा और नमक से ही गुजारा करना पड़ा। उनकी दूसरी पत्नी, जो खुद पूर्व लड़ाकू हैं, की सरकारी नौकरी की बदौलत ही वह इस साल छोटा कारोबार शुरू कर सके।

उनका कहना है कि जिस तमिल समाज के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी, वही आज उन्हें नजरअंदाज करता है। “जब हम हथियारों के साथ थे, लोग हमें सम्मान देते थे। अब वही लोग ताने मारते हैं—‘मिला तुम्हें तमिल ईलम?’”

सामाजिक अपमान और मानसिक पीड़ा

कई पूर्व लड़ाके अपने ही समाज में उपहास का शिकार होते हैं। कुछ को अपना शहर छोड़कर दूसरे इलाकों में बसना पड़ा ताकि उनकी पहचान छिपी रह सके। एक महिला ने बताया कि वह अपने पति को घर से बाहर नहीं जाने देती क्योंकि लोग उसका मजाक उड़ाते हैं और वह झगड़े में पड़ जाता है।जिन लड़ाकों को गंभीर चोटें आई हैं या जो शारीरिक रूप से कमजोर हैं, उनकी स्थिति और भी खराब है। कुछ सामाजिक समूह और प्रवासी तमिल समुदाय उनकी मदद करते हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

आर्थिक शोषण और मजबूरी

कई पूर्व लड़ाके आर्थिक शोषण का भी शिकार हो रहे हैं। कुछ बिचौलिये विदेशों से आने वाली मदद का बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं। एक पूर्व लड़ाके ने बताया कि अगर 100 पाउंड भेजे जाते हैं, तो उन्हें केवल 40-50 पाउंड ही मिलते हैं।कर्ज के जाल में फंसे ये लोग सूदखोरों के भी शिकार बन रहे हैं। कुछ मामलों में हालात इतने खराब हो गए कि एक महिला को मजबूरी में वेश्यावृत्ति का सहारा लेना पड़ा, जबकि एक अन्य महिला ने कर्ज चुकाने के लिए अपनी किडनी बेच दी।

सरकारी मदद और भविष्य की अनिश्चितता

श्रीलंकाई सरकार कुछ विकलांग पूर्व लड़ाकों को सीमित आर्थिक सहायता देती है, लेकिन अधिकांश को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। कई लोगों का कहना है कि भारत और नेपाल में आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों को बेहतर पुनर्वास पैकेज मिलते हैं, जबकि उन्हें सम्मान और अवसर दोनों से वंचित रखा गया है।

आज इन पूर्व लड़ाकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वे काम करने में सक्षम नहीं रहेंगे, तब उनका क्या होगा। उनके लिए जिंदगी सिर्फ जीवित रहने की जद्दोजहद बनकर रह गई है।

अंततः, इन पूर्व तमिल टाइगर्स के लिए यह सिर्फ एक टूटा हुआ सपना नहीं है, बल्कि हर दिन उस टूटे हुए सपने के साथ जीने की मजबूरी है—एक ऐसी जिंदगी, जो संघर्ष, अपमान और अनिश्चितता से भरी हुई है।

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