होर्मुज संकट से सिर्फ तेल ही नहीं, अब इन 3 चीजों के लिए तरसेगा बाजार
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होर्मुज संकट से सिर्फ तेल ही नहीं, अब इन 3 चीजों के लिए तरसेगा बाजार

ईरान-अमेरिका वार्ता बेनतीजा रहने से होर्मुज स्ट्रेट का संकट गहराया, हीलियम, सल्फर और एल्यूमिनियम की किल्लत से रक्षा और टेक सेक्टर में मची अफरा-तफरी।


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Strait Of Hormuz Closure : ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव अब केवल कूटनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा है। शनिवार को पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई समझौते की कोशिश बेनतीजा रहने के बाद दुनिया पर आर्थिक संकट के बादल और गहरे हो गए हैं। दोनों देश अपने अड़ियल रुख पर कायम हैं, जिसका सीधा असर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर पड़ रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमले के बाद से ईरान ने इस रणनीतिक समुद्री रास्ते को पूरी तरह बंद कर रखा है। यह रास्ता बंद होने से केवल कच्चा तेल और गैस ही नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध और तकनीक के लिए जरूरी तीन महत्वपूर्ण तत्वों हीलियम, सल्फर और एल्यूमिनियम की वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है।



हीलियम का संकट: गायब हो रही है आधुनिक तकनीक की सांस
आमतौर पर हीलियम को गुब्बारों में भरने वाली गैस माना जाता है, लेकिन यह आधुनिक अर्थव्यवस्था और सेना की रीढ़ है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया के सामने हीलियम का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। यह गैस एमआरआई मशीनों को ठंडा रखने, सेमीकंडक्टर चिप बनाने और एयरोस्पेस उद्योग के लिए अनिवार्य है। हीलियम की सबसे बड़ी विशेषता और समस्या यह है कि इसे लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता; तरल रूप में यह करीब 45 दिनों में खुद-ब-खुद उड़कर खत्म होने लगती है।

दुनिया में हीलियम का सबसे बड़ा सप्लायर कतर है। कतर के रास लाफान में दुनिया का सबसे बड़ा हीलियम प्लांट स्थित है। ईरान युद्ध के चलते कतर से होने वाली सप्लाई बाधित हो गई है, जिससे बाजार में हर महीने करीब 5.2 मिलियन क्यूबिक मीटर हीलियम कम पहुंच रही है। इसके चलते हीलियम की कीमतें रातों-रात दोगुनी हो गई हैं। अगर यह सप्लाई जल्द बहाल नहीं हुई, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए जरूरी चिप निर्माण और मिसाइल-सैटेलाइट जैसे रक्षा उपकरणों का उत्पादन पूरी तरह ठप हो सकता है।

सल्फर और तांबा: अमेरिकी सैन्य ताकत पर बड़ा खतरा
होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के करीब 50 फीसदी सल्फर का व्यापार होता है। इस रास्ते के बंद होने से सल्फर की कीमतें 165 फीसदी तक बढ़ गई हैं। अमेरिका अपनी जरूरतों के लिए सल्फर पर बहुत अधिक निर्भर है, क्योंकि इसका 90 फीसदी उपयोग वह सल्फ्यूरिक एसिड बनाने में करता है। सल्फ्यूरिक एसिड वह रसायन है जो पावर ग्रिड से लेकर सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों के निर्माण तक में इस्तेमाल होता है। यह बैटरी बनाने और तांबा (Copper) निकालने की प्रक्रिया में भी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सल्फर की कमी का सीधा असर तांबे के उत्पादन पर पड़ रहा है। तांबा एक रणनीतिक धातु है जिसका इस्तेमाल सैन्य संचार उपकरणों और मोटरों में होता है। इसके अलावा, जेट इंजन और ड्रोन की बैटरियों के लिए जरूरी निकल और कोबाल्ट का निष्कर्षण भी सल्फ्यूरिक एसिड पर ही निर्भर है। सल्फर का संकट गहराने का मतलब है कि अमेरिकी सेना के डिजिटल और बिजली प्रणालियों के लिए आवश्यक उपकरणों का औद्योगिक उत्पादन खतरे में है। यह कमी आधुनिक लड़ाकू विमानों जैसे एफ-35 के माइक्रोचिप्स की सप्लाई को भी प्रभावित कर सकती है।

एल्यूमिनियम का बाजार: चार साल के उच्चतम स्तर पर कीमतें
युद्ध के मैदान में एल्यूमिनियम की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। विमान, बख्तरबंद गाड़ियां और गोला-बारूद बनाने में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी इस सैन्य टकराव ने एल्यूमिनियम के बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एल्यूमिनियम की कीमतें 10 फीसदी तक उछलकर 3,492 पाउंड प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई हैं, जो पिछले चार सालों का सबसे ऊंचा स्तर है।

खाड़ी देशों की वैश्विक एल्यूमिनियम उत्पादन में 9 फीसदी की हिस्सेदारी है। ईरानी हमलों ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन के बड़े एल्यूमिनियम प्लांटों को काफी नुकसान पहुंचाया है। चूंकि पश्चिमी देश पहले ही रूस पर अपनी निर्भरता कम कर चुके हैं, ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना गैर-चीनी एल्यूमिनियम आपूर्ति के करीब एक-चौथाई हिस्से को खतरे में डालता है। अमेरिका और यूरोप अपनी जरूरत का आधा एल्यूमिनियम आयात करते हैं, जिसका बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। अब इस आपूर्ति के रुकने से पूरी दुनिया में निर्माण और रक्षा क्षेत्र की लागत बढ़ना तय है।


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