
होर्मुज पर दांव और ट्रंप का यू-टर्न, पश्चिम एशिया की सियासत बदली
युद्धविराम के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को वार्ता का केंद्र बनाकर अमेरिका-इजरायल की रणनीति पलट दी है। इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने के संकेत मिल रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अंतिम समय में घोषित युद्धविराम ने ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की युद्ध नीति को पूरी तरह पलट दिया है। दो हफ्तों के इस संघर्षविराम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब न तो ईरान के समृद्ध यूरेनियम का मुद्दा प्रमुख रहा और न ही वहां शासन परिवर्तन की बात। इसके बजाय, ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज Strait of Hormuz को स्थायी शांति वार्ता के केंद्र में ला खड़ा किया है।
ट्रंप का यह स्वीकार करना कि ईरान की 10-सूत्रीय योजना जिसे उन्होंने कुछ दिन पहले अपर्याप्त कहा था अब बातचीत का आधार बन सकती है, यह दिखाता है कि ईरान ने इस युद्ध को अपने पक्ष में मोड़ लिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य: संघर्ष का केंद्र
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस गुजरता है। फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद इस मार्ग के प्रभावित होने से तेल की कीमतों में भारी उछाल आया।अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो युद्ध से पहले लगभग 71 डॉलर थी यानी करीब 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी।
वैश्विक बाजार पर असर
युद्ध के कारण केवल कीमतें ही नहीं बढ़ीं, बल्कि आपूर्ति भी बुरी तरह प्रभावित हुई। खाड़ी क्षेत्र में स्थित तेल रिफाइनरी, एलएनजी टर्मिनल और अन्य उत्पादन इकाइयों पर हमलों के चलते उत्पादन ठप हो गया।अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, मार्च में खाड़ी देशों ने सामूहिक रूप से लगभग 7.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति बंद कर दी थी, जो अप्रैल में बढ़कर 9.1 मिलियन बैरल तक पहुंच सकती थी। इसका मतलब है कि क्षेत्र की 40-45 प्रतिशत उत्पादन क्षमता बाजार से बाहर हो गई।
जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट
युद्ध शुरू होते ही होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी गिरावट आई। जहां पहले रोजाना औसतन 150 से अधिक जहाज गुजरते थे, वहीं मार्च में यह संख्या घटकर 5 से भी कम रह गई।खासतौर पर एलएनजी जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई। बीमा कंपनियों ने जोखिम के चलते कवरेज देने से इनकार कर दिया, जिससे समुद्री व्यापार लगभग रुक गया।
एशिया पर ज्यादा असर
इस संकट का सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ा, खासकर दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर। विशेषज्ञों के अनुसार, खाड़ी से एशिया तक जहाजों को पहुंचने में लगभग 20 दिन लगते हैं, जबकि यूरोप तक यह समय करीब 39 दिन है।युद्ध शुरू होने से पहले एशिया के लिए रवाना हुए जहाज तो पहुंच गए, लेकिन नई आपूर्ति रुकने से संकट गहरा गया।
ईरान की रणनीतिक बढ़त
इस पूरे संघर्ष में ईरान की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने वार्ता का एजेंडा बदल दिया। उसने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी शांति समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन और नियंत्रण का मुद्दा शामिल होगा।ईरान चाहता है कि इस जलमार्ग का नियंत्रण क्षेत्रीय देशों खासकर ईरान और ओमान—के हाथ में हो, न कि बाहरी शक्तियों के।
ओमान की भूमिका और अधिकार
ईरान ने अपने प्रस्ताव में ओमान के अधिकारों को भी मान्यता दी है। उसने यह स्वीकार किया है कि होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से वसूले जाने वाले शुल्क में ओमान की भी हिस्सेदारी होगी।ओमान पहले भी ईरान-अमेरिका वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है और इस बार भी उसकी भूमिका अहम मानी जा रही है।
नई क्षेत्रीय व्यवस्था की ओर संकेत
ईरान की पहल यह संकेत देती है कि वह क्षेत्रीय देशों के साथ मिलकर एक नई सुरक्षा व्यवस्था बनाना चाहता है, जिसमें बाहरी शक्तियों खासकर अमेरिका की भूमिका सीमित हो।विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट खाड़ी देशों के लिए एक ऐतिहासिक अवसर हो सकता है, जहां वे मिलकर एक नई क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना विकसित कर सकते हैं।
हालांकि युद्धविराम ने राहत दी है, लेकिन स्थिति अभी भी नाजुक बनी हुई है। इजरायल-लेबनान तनाव और अन्य मुद्दे इस समझौते को कमजोर कर सकते हैं। फिर भी, होर्मुज जलडमरूमध्य को केंद्र में लाकर ईरान ने इस संघर्ष की दिशा बदल दी है और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन के नए संकेत दिए हैं।

