
इंदिरा गांधी के हत्यारे का भतीजा निकला न्यूज़ीलैंड का बड़ा ड्रग तस्कर, पहचान छिपाने की कानूनी लड़ाई हारा
सतवंत सिंह के भतीजे बलतेज सिंह को न्यूज़ीलैंड में अब तक की सबसे बड़ी ड्रग जब्ती में गिरफ्तार किया गया था। उसे 22 साल की सज़ा मिली हुई है।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे उनके बॉडीगार्ड सतवंत सिंह का भतीजा बलतेज सिंह आखिरकार अपनी पहचान सार्वजनिक न करने की कानूनी लड़ाई हार गया। बलतेज सिंह न्यूज़ीलैंड की अदालत में ड्रग तस्करी के एक मामले में 22 साल की सज़ा काट रहा है। उसने अपनी पहचान गोपनीय रखने की भरसक कोशिश की। इसके लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ी लेकिन वो हार गया और अब कोर्ट के फैसले के बाद उसकी पहचान सार्वजनिक हो गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, बलतेज सिंह 700 किलोग्राम से अधिक मेथामफेटामाइन की तस्करी के मामले में 22 साल की सजा काट रहा है। यह न्यूज़ीलैंड में अब तक की सबसे बड़ी ड्रग जब्ती मानी जाती है। सतवंत सिंह के भतीजे बलतेज सिंह को 2023 में गिरफ्तार किया गया था। शनिवार को Stuff वेब पोर्टल की रिपोर्ट में बताया गया कि बलतेज सिंह अपनी पहचान को स्थायी रूप से गोपनीय रखने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहा था।
इससे पहले, सिंह को हाई कोर्ट से स्थायी नाम-गोपनीयता (Name Suppression) मिल गई थी। उसने तर्क दिया था कि अगर उसकी पहचान उजागर हुई तो उसे और उसके परिवार को गंभीर मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
हालांकि, न्यूज़ीलैंड प्रशासन ने इस फैसले को चुनौती दी और पिछले नवंबर में कोर्ट ऑफ अपील ने फैसला सुनाया कि बलतेज सिंह की पहचान सार्वजनिक की जा सकती है।
इसके बाद, ऑकलैंड के पूर्व व्यवसायी सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति मांगी, लेकिन अब उसने यह अपील वापस ले ली है, जिससे न्यूज़ीलैंड मीडिया के लिए उनकी पहचान उजागर करने का रास्ता साफ हो गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि Stuff ने भी बलतेज सिंह की पहचान गोपनीय रखने की मांग का विरोध किया था। अभियोजन पक्ष ने अदालत में पहले ही तर्क दिया था कि भारतीय मीडिया में बलतेज सिंह की पहचान पहले से उजागर हो चुकी है।
अदालत में दायर एक हलफनामे में बलतेज सिंह के पिता ने कहा था कि उनका परिवार दुनियाभर के सिखों और हिंदुओं के बीच “कुख्यात” हो चुका है और उन्हें लगातार हिंसा, धमकियों और डराने-धमकाने का सामना करना पड़ता है।
गौरतलब है कि 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली में सिख समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा और हत्याएं हुई थीं।

