बजट में टैरिफ दरों में बदलाव, क्या ट्रंप की धमकियों को रोक सकता है भारत?
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बजट में टैरिफ दरों में बदलाव, क्या ट्रंप की धमकियों को रोक सकता है भारत?

Union Budget: भले ही केंद्र ने सात टैरिफ शुल्क हटा दिए हों. लेकिन सीमा शुल्क मूल्यांकन प्रणाली मनमाने प्रशासनिक हस्तक्षेप की गुंजाइश छोड़ती है.


Donald Trump tariff policy: इस सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी टैरिफ नीति के बारे में घोषणा की. उनके इस टैरिफ नीति से सबसे अधिक फार्मास्युटिकल्स, चिप्स, स्टील, एल्युमीनियम और कॉपर प्रभावित होंगे. ट्रंप ने बिना किसी संकोच के कहा कि उनका मकसद राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना है. इसके तहत ट्रंप ने रविवार को एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किए. इसके बाद मैक्सिको, कनाडा और चीन से आयातित सामानों पर भारी टैरिफ लग गया.

टैरिफ का खतरा

भारत के लिए यह चिंता का विषय है. अप्रैल-नवंबर में भारत ने अमेरिका को $5.8 बिलियन मूल्य की दवा निर्माण सामग्री का निर्यात किया था. साल 2023-24 में अमेरिका को $8.0 बिलियन मूल्य की फार्मा निर्यात की गई थी. अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली 40% जेनेरिक दवाएं भारत से जाती हैं और भारत यूरोप में भी बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है. भारत से अमेरिका को स्टील और स्टील उत्पादों का निर्यात $2.3 बिलियन है. जबकि, एल्युमीनियम उत्पादों का निर्यात $516 मिलियन का है.

जोखिम के बावजूद बदलाव

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में सात टैरिफ कस्टम दरों को समाप्त करने की घोषणा की. जिससे संशोधन के बाद केवल आठ टैरिफ दरें बचीं हैं. अमेरिकी निर्यातक लंबे समय से भारत की जटिल टैरिफ संरचना को लेकर असंतोष जता रहे थे. हालांकि, सात कस्टम ड्यूटी समाप्त कर दी गई. लेकिन कस्टम मूल्यांकन प्रणाली विवेकाधीन है.

भारतीय उद्योग को झटका?

अमेरिका लंबे समय से कुछ चिकित्सा और डायग्नोस्टिक उपकरणों पर टैक्स में कमी की मांग कर रहा था. जैसे कि स्टेंट्स. घरेलू स्टेंट्स की कीमत विदेशी स्टेंट्स से आधी होती है. अमेरिकी कंपनियां भारतीय बाजार में इनकी आपूर्ति में रुचि रखती हैं. साल 2025 के बजट में जीवनरक्षक चिकित्सा उपकरणों पर टैरिफ पूरी तरह समाप्त करने की घोषणा भारतीय स्थानीय निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा बनाए रखना मुश्किल कर सकती है.

व्यापार असंतुलन

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) लंबे समय से भारत पर उच्च टैरिफ दरों को लेकर दबाव बना रहे हैं. कुछ मामलों में भारत में फार्मास्युटिकल उत्पादों और जीवनरक्षक दवाओं पर 20% से अधिक बेसिक कस्टम ड्यूटी लगाई जाती है. साल 2022 में अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा $45.7 बिलियन था.

- अमेरिकी निर्यात = $73 बिलियन

- भारतीय आयात = $118.8 बिलियन

गैर-टैरिफ बाधाएं और अतिरिक्त टैक्स

विश्लेषकों का मानना है कि भारत गैर-टैरिफ टैक्स के जरिए से अभी भी लचीलापन बनाए हुए है. 10% अधिभार (सर्जचार्ज) आयात पर लगाया जाता है. जो अन्य शुल्कों के मूल्य पर आधारित होता है न कि वास्तविक कस्टम मूल्य पर. भारत कृषि उत्पादों पर नियमित रूप से सर्जचार्ज बदलता रहता है. 1% लैंडिंग शुल्क सभी आयातित उत्पादों पर लगाया जाता है. जब तक कि इसे विशेष अधिसूचना द्वारा छूट नहीं दी जाती.

राज्य-स्तरीय गैर-टैरिफ बाधा

राज्य सरकारों द्वारा लागू गैर-टैरिफ बाधाएं भी आयात को प्रभावित कर रही हैं. इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और मोबाइल फोन पर टैरिफ हटाने से ज्यादा फायदा नहीं होगा. क्योंकि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षमता सीमित है. अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल निर्माण कर प्रोत्साहन के कारण अधिक लाभकारी है. टैरिफ हटने के बावजूद भारत में मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकारी नियमन और प्रक्रियाएं जटिल बनी हुई हैं. जैसे कि Apple के लिए iPhones बनाने वाली Foxconn कंपनी पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया में फंसी हुई है.

प्रतिस्पर्धा

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के महानिदेशक डॉ. अजय सहाई का मानना है कि अमेरिकी टैरिफ के चलते उन्नत इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का विनिर्माण अमेरिका से वियतनाम में स्थानांतरित हो सकता है. चीन से वियतनाम और अमेरिका से वियतनाम उत्पादन जा सकता है. लेकिन भारत को इससे ज्यादा लाभ नहीं मिलेगा. भारत को श्रम प्रधान मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा करनी होगी. क्योंकि, वियतनाम में सीमित श्रमिक उपलब्धता है.

लागत में विशेष लाभ नहीं

भारत में निर्माण करने वाली अमेरिकी कंपनियों को भी ज्यादा फायदा नहीं होगा. जैसे ही वे अपने उत्पाद अमेरिका भेजेंगी, उन पर अमेरिकी टैरिफ लगेगा. कोई फर्क नहीं पड़ता कि उत्पाद कहां निर्मित हो रहे हैं. जैसे ही वे अमेरिकी बाजार में प्रवेश करेंगे, उन्हें टैरिफ का सामना करना पड़ेगा.

ट्रंप प्रशासन की मांग

यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारतीय नीति निर्माता पहले से ही उन विवादित मुद्दों पर समझौता कर रहे हैं. जो ट्रंप प्रशासन आगे उठाएगा? अमेरिकी व्यापार विभाग (USTD) लंबे समय से डिजिटल उत्पादों और सेवाओं के निर्यात से जुड़ी नीतियों पर अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है. डेटा ट्रांसफर और सेवा आपूर्तिकर्ताओं को लेकर नीति परिवर्तन की दिशा में भारत झुक सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी अमेरिका यात्रा के दौरान वह क्या सौदेबाजी करेंगे? क्या भारत व्यापार असंतुलन और टैरिफ पर ट्रंप की शर्तें मान लेगा या अपनी शर्तों पर व्यापार नीति तय करेगा? आगे क्या होगा, यह मोदी सरकार के अगले कदम पर निर्भर करेगा!

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