
ईरान और इज़राइल: कभी थे पक्के दोस्त, अब बन गए कट्टर दुश्मन, जानिए कैसे बदली पूरी कहानी?
1948 से लेकर 1970 के दशक तक दोनों देश गुप्त सहयोगी थे और इराक के खिलाफ मिलकर काम करते थे। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद इनके रिश्ते सार्वजनिक रूप से दुश्मनी में बदल गए।
आज मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) युद्ध की आग में जल रहा है। ईरान और इज़राइल, जो कभी एक-दूसरे के गुप्त साझेदार हुआ करते थे, आज एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। हाल ही में हुए हमलों और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबरों ने इस तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 1948 में इज़राइल बनने के बाद ईरान उसे मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम देश था? उस समय दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध थे और ईरान इज़राइल को तेल भी बेचता था।
जब इराक था साझा दुश्मन
1960 और 70 के दशक में ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस वक्त इज़राइल और ईरान के रिश्ते बेहद करीबी थे। दोनों का एक ही दुश्मन था इराक के सद्दाम हुसैन। इज़राइल चारों तरफ से अरब देशों से घिरा था, वहीं ईरान को इराक की बढ़ती ताकत से डर था। इसी डर ने दोनों को साथ ला दिया। इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की सावाक (SAVAK) ने मिलकर इराक के खिलाफ काम किया। यहाँ तक कि इज़राइल ने ईरान को उस वक्त तेल के बदले हथियार दिए, जब कोई और देश इज़राइल को तेल देने को तैयार नहीं था।
1979 की क्रांति और बदलता मंजर
1979 में ईरान में 'इस्लामिक क्रांति' हुई और सत्ता अयातुल्ला खुमैनी के हाथ में आ गई। उन्होंने अमेरिका को 'बड़ा शैतान' और इज़राइल को 'छोटा शैतान' घोषित कर दिया। लगा कि दोस्ती खत्म हो गई, लेकिन पर्दे के पीछे कहानी कुछ और थी। जब 1980 में इराक ने ईरान पर हमला किया, तो ईरान को हथियारों की सख्त जरूरत थी। तब कट्टर दुश्मन होने के बावजूद इज़राइल ने गुप्त रूप से ईरान को लड़ाकू विमानों के कल-पुर्जे सप्लाई किए ताकि इराक को हराया जा सके।
ईरान-कॉन्ट्रा घोटाला
1980 के दशक में 'ईरान-कॉन्ट्रा' मामले ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। अमेरिका ने इज़राइल के जरिए ईरान को गुप्त रूप से हथियार बेचे। यह सौदा लेबनान में बंधक बनाए गए अमेरिकियों को छुड़ाने के लिए किया गया था। यानी दुनिया के सामने दुश्मन दिखने वाले ये देश जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद कर रहे थे।
दोस्ती से कट्टर दुश्मनी तक
1990 के दशक के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। इराक कमजोर हो चुका था और सोवियत संघ टूट गया था। अब इज़राइल और ईरान को एक-दूसरे की जरूरत नहीं रही। ईरान ने हमास और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को समर्थन देना शुरू किया, जो सीधे इज़राइल पर हमले करते हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने आग में घी डालने का काम किया। क्योंकि इज़राइल लंबे समय से ईरान के साथ होने वाले समझौतों का विरोध करता रहा है। उसका मानना है कि ईरान उसके लिए एक बड़ा खतरा है। इसी वजह से वह अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर दबाव बनाता रहा है।
हाल के सालों में यह संघर्ष और खुलकर सामने आया। 2024 में पहली बार दोनों देशों के बीच सीधा टकराव हुआ। 2025 में इज़राइल ने ईरान पर बड़े हमले किए, जिसमें कई सैन्य अधिकारी और वैज्ञानिक मारे गए।
क्या छिड़ेगा तीसरा विश्व युद्द?
आज वक्त का पहिया घूम चुका है। 2026 में हालात इतने खराब हैं कि दोनों देश सीधी जंग लड़ रहे हैं। हज़ारों मिसाइलें दागी जा चुकी हैं। अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद ईरान और इज़राइल के बीच का तनाव अब उस मोड़ पर है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं लगती। इतिहास गवाह है कि राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न दुश्मन, सिर्फ 'हित' स्थाई होते हैं।

