
करीबी दोस्ती से कट्टर दुश्मनी तक, ये है अमेरिका-ईरान रिश्तों की कहानी
यह समझने के लिए कि ये देश कैसे एक-दूसरे के विरोधी बने, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के उस दौर को देखना आवश्यक है, जब ईरान एक राजशाही था और पश्चिमी शक्तियों के...
ईरान, संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल के बीच चल रहा वर्तमान संघर्ष एक जटिल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में निहित है, जिसकी जड़ें कई दशकों पुरानी हैं। आज जो गहरी शत्रुता दिखाई देती है, वह कभी वैश्विक राजनीति, ऊर्जा हितों और बदलते शक्ति संतुलन से प्रभावित एक करीबी रणनीतिक साझेदारी हुआ करती थी।
यह समझने के लिए कि ये देश कैसे एक-दूसरे के विरोधी बने, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के उस दौर को देखना आवश्यक है, जब ईरान एक राजशाही था और पश्चिमी शक्तियों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था।
साल 1951 में ईरान ने मोहम्मद मोसद्देक को प्रधानमंत्री चुना, जो राजनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। मोसद्देक ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जिससे ब्रिटेन के स्वामित्व वाली एंग्लो-ईरानियन ऑयल कंपनी का प्रभुत्व समाप्त हो गया। उस समय ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों और निर्यातकों में से एक था।
तख्तापलट
तेल के राष्ट्रीयकरण के इस फैसले पर पश्चिमी देशों की तीखी प्रतिक्रिया हुई। संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूनाइटेड किंगडम के साथ मिलकर सीआईए के माध्यम से एक तख्तापलट की योजना बनाई, जिसके तहत मोसद्देक को सत्ता से हटा दिया गया। इसके बाद मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के नेतृत्व में राजशाही को फिर से मजबूत किया गया।
शाह ने पश्चिमी शैली में तेज़ी से आधुनिकीकरण की नीति अपनाई और अमेरिका तथा इज़राइल दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे। इस दौर में ईरान ने कई पश्चिमी सांस्कृतिक और आर्थिक प्रणालियों को अपनाया और शीत युद्ध के समय एक महत्वपूर्ण सहयोगी बन गया।
हालांकि, समय के साथ राजनीतिक विरोध बढ़ने लगा। अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए शाह ने कठोर और दमनकारी उपाय अपनाए और गुप्त सावाक (SAVAK) के माध्यम से विरोधियों को गिरफ्तार कर जेल में डाला।
क्रांति
लगभग चार दशकों तक सत्ता में रहने के बाद जनता का आक्रोश 1979 की ईरानी क्रांति के रूप में सामने आया। व्यापक विरोध प्रदर्शनों के कारण शाह को देश छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा।
अमेरिका ने शाह के सत्ता से हटने के बाद भी उसका समर्थन जारी रखा और उसे शरण दी, जिससे ईरानी जनता में विशेष रूप से अमेरिका और इज़राइल के प्रति नाराजगी और बढ़ गई। क्योंकि उन्हें एक अलोकप्रिय शासन का समर्थक माना गया।
इस क्रांति के बाद आयतोल्ला रूहोल्ला खोमैनी सत्ता में आए। नई सरकार ने तेल सहित कई प्रमुख क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण किया और ईरान की राजनीतिक तथा विदेश नीति की दिशा को पूरी तरह बदल दिया।
संबंधों का टूटना
ईरान और अमेरिका के संबंध तेजी से बिगड़ गए। ईरानी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा। इस घटना ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को पूरी तरह समाप्त कर दिया। तब से दोनों देशों के बीच बातचीत मुख्यतः अप्रत्यक्ष रूप से, मध्यस्थों या तीसरे देशों के माध्यम से होती रही है।
क्रांति के बाद अमेरिका ने इराक के नेता सद्दाम हुसैन को ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने में समर्थन दिया। यह युद्ध आठ वर्षों तक चला लेकिन अंततः इसने ईरान के भीतर नई सरकार के प्रति समर्थन को और मजबूत कर दिया।
बढ़ता तनाव
हालांकि 20वीं सदी के अंतिम वर्षों में तनाव लगातार बना रहा। खाड़ी युद्ध जैसे घटनाक्रमों के बीच ध्यान भले ही कुछ समय के लिए हट गया हो। लेकिन 11 सितंबर के हमलों के बाद यह क्षेत्र फिर से वैश्विक केंद्र में आ गया।
ईरान ने विशेष रूप से फिलिस्तीन मुद्दे पर इज़राइल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के भड़काऊ बयानों ने तनाव को और बढ़ा दिया।
इसी बीच अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) जैसे संस्थानों के माध्यम से इसे नियंत्रित करने की कोशिश की।
क्षेत्रीय गठबंधन
ईरान ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हौथी विद्रोहियों और सीरिया जैसे देशों के साथ संबंध बनाकर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया। गाज़ा में हमास के साथ भी उसके सामरिक संबंध रहे।
साथ ही, रूस, चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों के समर्थन से ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, जिससे उसके परमाणु क्षमता हासिल करने की आशंका बढ़ गई। अमेरिका और इज़राइल ने इन सभी गतिविधियों को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना, जिससे आपसी अविश्वास और गहरा हो गया।
वर्तमान संघर्ष
हाल के घटनाक्रमों ने इस तनाव को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। फिर 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इज़राइल पर किए गए हमले ने क्षेत्र में संघर्ष को और तीव्र कर दिया।
गाज़ा में इज़राइल की सैन्य कार्रवाई और अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप और बेन्जामिन नेतन्याहू जैसे नेताओं की भूमिका भी शामिल रही। इसने ईरान को भी इस टकराव के दायरे में ला दिया है।
आज जो स्थिति सामने है, वह कोई अचानक उत्पन्न हुआ संकट नहीं है। बल्कि दशकों से चले आ रहे भू-राजनीतिक संघर्ष, ऐतिहासिक असंतोष और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है।

