जेल, जंग और जज्बा, ईरानी महिलाओं की अनकही कहानी
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जेल, जंग और जज्बा, ईरानी महिलाओं की अनकही कहानी

ईरान में दमन, युद्ध और सख्त कानूनों के बीच महिलाएं संघर्ष और बदलाव की नई कहानी लिख रही हैं, जहां प्रतिरोध और प्रगति साथ-साथ चल रहे हैं।


मध्य-पूर्व, विशेष रूप से ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों में रहने वाले लोगों के लिए स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानवाधिकार कोई किताबों में पढ़ी जाने वाली अवधारणाएं भर नहीं हैं, बल्कि ये उनके जीवन के कठोर अनुभवों से उपजी समझ हैं। दमन, भेदभाव और सत्ता की कठोरता ने यहां के समाज को इन मूल्यों के महत्व का एहसास कराया है। यही भावना ईरान की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी के उस पत्र में भी झलकती है, जिसे उन्होंने 2023 में नॉर्वेजियन नोबेल समिति को लिखा था। उस समय वे तेहरान की एविन जेल में बंद थीं और महिलाओं के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष को वैश्विक मान्यता मिल रही थी।

मशहद की रहने वाली 53 वर्षीय मोहम्मदी को कई बार गिरफ्तार किया जा चुका है। दिसंबर 2025 में उनकी नवीनतम गिरफ्तारी के बाद से वे लगातार जेल में हैं और हाल ही में उन्हें साढ़े सात साल की सजा सुनाई गई है। उनका मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि ईरान में महिलाओं की स्थिति का प्रतीक बन चुका है।

हाल के घटनाक्रमों ने इस परिदृश्य को और जटिल बना दिया है। अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त सैन्य अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि देश में एक नया लोकतांत्रिक दौर शुरू हो सकता है। लेकिन उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई के सत्ता संभालने के बाद सुधार की संभावनाएं धुंधली नजर आ रही हैं। इसके साथ ही देशव्यापी इंटरनेट बंदी ने हालात को और गंभीर बना दिया है, खासकर महिलाओं के लिए, जो पहले ही अनेक प्रतिबंधों का सामना कर रही हैं।

महिला अधिकार कार्यकर्ता सुसन तहमासेबी के अनुसार, मोजतबा खामेनेई का सार्वजनिक जीवन में कम सक्रिय होना और उनके साथ जुड़े लोगों का कठोर रुख यह संकेत देता है कि महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष और कठिन हो सकता है। “वूमन, लाइफ, फ्रीडम” आंदोलन से जो उपलब्धियां हासिल हुई थीं, उन पर भी खतरा मंडरा रहा है।

ईरान में महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा महसा अमीनी की 2022 में हुई मौत के बाद वैश्विक बहस का केंद्र बन गया। हिजाब नियमों के कथित उल्लंघन के कारण हिरासत में ली गई 22 वर्षीय अमीनी की मौत ने देशभर में विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया। इस घटना ने न केवल सरकार के खिलाफ आक्रोश को उजागर किया, बल्कि महिलाओं के अधिकारों के लिए एक व्यापक आंदोलन को जन्म दिया।

मानवाधिकार संगठनों ने अमीनी की मौत की कड़ी निंदा की और इसे दमनकारी व्यवस्था का उदाहरण बताया। इसके बाद शुरू हुआ “वूमन, लाइफ, फ्रीडम” आंदोलन आज भी विभिन्न रूपों में जारी है। हालांकि सरकार ने तकनीकी निगरानी और सख्त कानूनों के जरिए नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन महिलाएं लगातार इन सीमाओं को चुनौती दे रही हैं।

ईरान में अनिवार्य हिजाब कानून इस संघर्ष का सबसे स्पष्ट प्रतीक है। 2024 में प्रस्तावित ‘हिजाब और शील कानून’ में भारी जुर्माने, यात्रा प्रतिबंध और लंबी जेल सजा जैसे प्रावधान शामिल थे, हालांकि जन विरोध के कारण इसे लागू करने पर फिलहाल रोक लगी है। इसके बावजूद, मौजूदा कानून लागू हैं और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, फेस रिकग्निशन और डिजिटल चेतावनियों के माध्यम से इन्हें लागू किया जा रहा है।

इसके बावजूद तेहरान जैसे शहरों में महिलाएं खुले तौर पर बिना हिजाब के सार्वजनिक स्थानों पर नजर आती हैं। यह एक “शांत क्रांति” का रूप ले चुका है, जो दर्शाता है कि विरोध केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में भी जारी है।ईरान की जेलों में बंद महिलाओं की कहानियां भी दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद स्थापित धार्मिक शासन व्यवस्था को इन उदाहरणों के माध्यम से आलोचना का सामना करना पड़ा है। पत्रकार रेहानेह तबाताबाई जैसी कई महिलाएं भी बार-बार जेल जा चुकी हैं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है।

हालांकि, इस पूरे परिदृश्य का एक दूसरा पहलू भी है। कई ईरानी महिलाएं इन प्रतिबंधों के बीच भी शिक्षा, कला और पेशेवर क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, विश्वविद्यालयों में पढ़ा रही हैं, पायलट, फायरफाइटर और वैज्ञानिक के रूप में काम कर रही हैं। वे सामाजिक जीवन में सक्रिय हैं और अपनी पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बना रही हैं।

नवंबर 2025 में पहली बार ईरान के सबसे पुराने सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा के लिए एक महिला कंडक्टर, पनिज फारयूसेफी की नियुक्ति इस बदलाव का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि सीमाओं के बावजूद महिलाओं की भागीदारी को पूरी तरह रोका नहीं जा सका है।

पूर्व भारतीय विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव के अनुसार, ईरानी महिलाएं शिक्षित, आत्मविश्वासी और सामाजिक रूप से सक्रिय हैं। वे पारंपरिक ढांचे के भीतर रहते हुए भी अपनी स्वतंत्रता को अभिव्यक्त करती हैं। हालांकि, वे यह भी मानती हैं कि युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता ने उनके जीवन को और कठिन बना दिया है।

ईरान में चल रहा संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। एक ओर जहां दमन और नियंत्रण की प्रवृत्ति है, वहीं दूसरी ओर प्रतिरोध, आत्मसम्मान और परिवर्तन की इच्छा भी उतनी ही मजबूत है।भविष्य को लेकर मतभेद स्पष्ट हैं। कुछ विशेषज्ञों को उम्मीद है कि शिक्षित समाज अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर बढ़ेगा, जबकि अन्य का मानना है कि युद्ध और दमन से यह प्रक्रिया और धीमी हो सकती है।

स्पष्ट है कि ईरान की महिलाओं की कहानी केवल पीड़ा की नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और जटिल वास्तविकताओं की भी है—जहां हर प्रतिबंध के बीच एक नई संभावना भी जन्म लेती है।

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