
ईरान युद्ध: सीज़फायर समझौते में स्पष्ट खतरे के संकेत
सीज़फायर के बाद लेबनान पर इज़राइल की बमबारी ने शांति को खतरे के कगार पर पहुंचा दिया है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ केएस दक्षिणा मूर्ति ने इस गंभीर स्थिति का विश्लेषण किया है।
ईरान युद्ध में दो हफ्तों का सीज़फायर भले ही कुछ राहत लेकर आया हो, लेकिन यह कायम रह पाएगा या स्थायी शांति में बदलेगा, इस पर अब भी तनाव बना हुआ है। इज़राइल अनिच्छा से इस समझौते में शामिल हुआ है, लेकिन वह इस बात पर अड़ा है कि लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप भी इस रुख का समर्थन कर रहे हैं।
सीज़फायर के बाद लेबनान पर इज़राइल की बमबारी, जिसमें 180 से अधिक नागरिक मारे गए, ने शांति को खतरे में डाल दिया है।
क्या सीज़फायर टिक पाएगा?
यह वही सवाल है जो पूरी दुनिया पूछ रही है। स्थिति काफी अस्थिर दिख रही है। अगर इज़राइल की बात करें, तो ऐसा लगता है कि उसके पास सारे पत्ते हैं। जून 2025 में जब बातचीत चल रही थी, तब इज़राइल ने ही वार्ता को बाधित किया था और अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर बमबारी शुरू कर दी थी।
इसी तरह इस साल भी हुआ—27 फरवरी तक बातचीत चल रही थी और 28 फरवरी को हमला हो गया, जिसे इज़राइल के प्रभाव में ट्रंप से जोड़कर देखा गया। यह दूसरी बार हुआ है।
सीज़फायर में ‘रेड फ्लैग’
मौजूदा स्थिति में सीज़फायर समझौते में कई स्पष्ट खतरे के संकेत हैं। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा लेबनान है।
लेबनान इस संघर्ष में तब शामिल हुआ, जब हिज़्बुल्लाह ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद इज़राइल पर रॉकेट दागे। इसके जवाब में इज़राइल ने कार्रवाई की, जो अब तक जारी है।
इज़राइल ने न सिर्फ हमले जारी रखे, बल्कि दक्षिणी लेबनान के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर अपनी मौजूदगी भी बढ़ा ली है और रणनीतिक स्थानों पर नियंत्रण कर लिया है। इस तरह, भले ही यह सीधे अमेरिका-इज़राइल के ईरान पर हमले से जुड़ा न हो, लेकिन लेबनान प्रभावी रूप से इज़राइल के साथ युद्ध की स्थिति में है।
जब सीज़फायर पर चर्चा हुई, तो पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि लेबनान भी इसका हिस्सा है। ईरान के प्रस्ताव, जिसे ट्रंप ने स्वीकार करने की बात कही थी, उसमें भी लेबनान शामिल था।
लेकिन बेंजामिन नेतन्याहू ने सीज़फायर का स्वागत करते हुए भी यह कहा कि लेबनान इसका हिस्सा नहीं है, और अमेरिका ने इसका विरोध नहीं किया। इससे नेतन्याहू को बड़ी छूट मिल जाती है, जो सीज़फायर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने चेतावनी दी है कि वह हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया तय मानी जा रही है और स्थिति फिर से वहीं पहुंच सकती है जहां से शुरू हुई थी।
बातचीत अभी शुरू भी नहीं हुई
अभी तक औपचारिक बातचीत शुरू भी नहीं हुई है, लेकिन उससे पहले ही इज़राइल ने लेबनान पर हमला कर अपनी अनिच्छा दिखा दी है। ऐसे में सीज़फायर काफी कमजोर नजर आता है। अब सब कुछ ईरान की प्रतिक्रिया और अमेरिका के जवाब पर निर्भर करेगा।
लेबनान को बाहर क्यों रखा जा रहा है?
इज़राइल के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हिज़्बुल्लाह है, जो लेबनान में एक मिलिशिया और राजनीतिक पार्टी दोनों के रूप में काम करता है।
इतिहास में 1982 में जब इज़राइल ने लेबनान पर कब्जा किया था, तब हिज़्बुल्लाह ने ही उसे पीछे हटने पर मजबूर किया था, जिससे उसकी मजबूत छवि बनी।
लेबनान में शिया समुदाय की बड़ी मौजूदगी है, और हिज़्बुल्लाह इस समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे उसकी राजनीतिक पकड़ काफी मजबूत है। उसके सांसद संसद में हैं और सरकार में मंत्री भी हैं।
हालांकि लेबनानी सेना मौजूद है, लेकिन उसकी ताकत हिज़्बुल्लाह जितनी प्रभावशाली नहीं दिखती। लेबनान में कई शक्ति केंद्र हैं—सेना, सरकार और हिज़्बुल्लाह नेतृत्व—और इनमें हिज़्बुल्लाह सबसे प्रभावशाली माना जाता है।
इज़राइल के लिए दो बड़े खतरे हैं: हिज़्बुल्लाह और ईरान। इज़राइल ने अमेरिका को कार्रवाई के लिए राजी कर ईरान के खिलाफ आंशिक रूप से कदम उठाया है, लेकिन हिज़्बुल्लाह अब भी एक बड़ा खतरा बना हुआ है। पहले हुए समझौतों में हिज़्बुल्लाह के हथियार डालने की बात हुई थी, लेकिन यह पूरी तरह लागू नहीं हो सका।
बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह हिज़्बुल्लाह को खत्म करने का एक मौका है, जिसे इज़राइल ईरान की तरह ही अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। यही कारण है कि वह लेबनान को छोड़ना नहीं चाहता और सीज़फायर के बावजूद हमले जारी रखे हुए है।
ट्रंप और नेतन्याहू के करीबी संबंध क्यों?
पिछले वर्षों में नेतन्याहू ने कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों—बराक ओबामा, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और जो बाइडेन—को ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन वे सहमत नहीं हुए।
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप उनके साथ खड़े हो गए। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने ओबामा द्वारा किए गए ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया, जो काफी हद तक इज़राइल के दबाव का परिणाम था। उन्होंने अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरूशलम स्थानांतरित कर दिया, जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादित माना जाता है।
इन फैसलों पर वैश्विक स्तर पर ज्यादा विरोध नहीं हुआ। बाद में जब इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला किया, तब भी प्रतिक्रिया सीमित रही। ट्रंप को लगा कि वे इसी रणनीति को दोहरा सकते हैं, लेकिन उन्होंने ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया का अनुमान नहीं लगाया था।
ट्रंप और इज़राइल के करीबी संबंधों के पीछे एक बड़ा कारण राजनीतिक समर्थन भी है। ट्रंप को AIPAC का मजबूत समर्थन प्राप्त है, जो अमेरिकी राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा, ट्रंप के समर्थन का बड़ा हिस्सा—ईसाई इवेंजेलिकल समूह—भी इज़राइल के पक्ष में हैं।
ये समूह उन्हें राजनीतिक और आर्थिक समर्थन देते हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से ट्रंप उनके हितों के अनुरूप नीतियां अपनाते हैं। इस तरह ट्रंप की इज़राइल के साथ नजदीकी राजनीतिक समर्थन, फंडिंग और विचारधारा के मेल का परिणाम है। हालांकि अंतिम निर्णय उनके होते हैं, लेकिन नेतन्याहू का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इज़राइल इतना मजबूत क्यों है?
अगर हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद इज़राइल की प्रतिक्रिया देखें, तो उसने गाज़ा में भारी जवाबी कार्रवाई की, जो लगभग दो साल तक जारी रही।
कई लोग इसे असंतुलित प्रतिक्रिया मानते हैं, जिसमें हजारों लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर तबाही हुई। इसके बावजूद, इज़राइल पर वैश्विक दबाव का असर सीमित ही दिखाई देता है, जो उसकी रणनीतिक और राजनीतिक ताकत को दर्शाता है।
वैश्विक आलोचना के बावजूद इज़राइल ने अपने सैन्य अभियान जारी रखे। इसका मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना है। किसी भी देश के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दे सकती है, और इसके स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक देश इसे वीटो कर सकता है।
अमेरिका पिछले कई दशकों से इज़राइल का लगातार बचाव करता रहा है, जिससे इज़राइल अंतरराष्ट्रीय परिणामों से काफी हद तक सुरक्षित रहा है। चाहे डोनाल्ड ट्रंप का दौर हो या जो बाइडेन का, अमेरिका ने इज़राइल को आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक समर्थन दिया है। इसी समर्थन के कारण इज़राइल बिना ज्यादा रोक-टोक के कार्रवाई कर पाता है।
यह वैश्विक व्यवस्था की गहरी समस्या को दर्शाता है, जहां ताकत के सामने जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है।
क्या कोई वैश्विक तंत्र है जो अमेरिका या इज़राइल को जवाबदेह ठहरा सके?
सैद्धांतिक रूप से यह अधिकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास है। उदाहरण के लिए, 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में कार्रवाई से पहले अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल किया था।
हालांकि, इराक के मामले में अमेरिका ने संभावित विरोध को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार कर दिया था।
मौजूदा ईरान संकट में भी अमेरिका ने काफी हद तक संयुक्त राष्ट्र और यहां तक कि अपने नाटो सहयोगियों की भी अनदेखी की है। यूरोपीय देश अमेरिकी कदमों कोरोकने में सफल नहीं हो पाए हैं।
चीन और रूस जैसे देशों की भूमिका भी सीमित या पर्दे के पीछे रही है। उदाहरण के तौर पर, चीन ने पाकिस्तान के जरिए सीज़फायर वार्ता को प्रभावित किया हो सकता है, लेकिन उसने सीधे अमेरिका को चुनौती नहीं दी।

