
पाकिस्तान के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने पर इजरायल को एतराज, कहा- कोई जरूरत नहीं है
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पीएम शरीफ को देश के भीतर भी आलोचना झेलनी पड़ रही है—क्योंकि पाकिस्तान में कई लोग इस चार्टर पर हस्ताक्षर को फ़िलिस्तीनी हितों के ख़िलाफ़ मान रहे हैं।
पाकिस्तानत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग़ज़ा और उससे आगे के लिए प्रस्तावित योजना के तहत ‘बोर्ड ऑफ पीस’ चार्टर पर हस्ताक्षर तो कर दिए, लेकिन अब वो दोतरफा फंस गया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ का अपने ही देश में विरोध शुरू हो गया, अब तो इजरायल को भी पाकिस्तान का शामिल होना नागवार गुजर रहा है। इज़राइल ने दो टूक कह दी है कि वह ग़ज़ा के संक्रमणकाल या शांति-रक्षक बलों में पाकिस्तान की किसी भूमिका को स्वीकार नहीं करेगा।
इजरायल को कबूल नहीं
शहबाज शरीफ उन मुश्किल से 20 देशों के नेताओं में शामिल थे जिन्होंने गुरुवार को दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रखे ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर दस्तखत किए। इन्हीं देशों में इज़राइल भी शामिल है, लेकिन इज़राइल के अर्थव्यवस्था मंत्री नीर बरकत ने पाकिस्तान को आतंकवाद के समर्थकों में शुमार किया है।
उन्होंने दावोस में एक भारतीय न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, “जिस किसी देश ने आतंक का समर्थन किया है, उसका स्वागत नहीं है… और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब पीएम शरीफ को देश के भीतर भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, उनकी इस चार्टर पर हस्ताक्षर करने की कथित जल्दबाज़ी को पाकिस्तान में कई लोग फ़िलिस्तीनी हितों के विरुद्ध मानते हैं।
जहाँ बरकत ने प्रभावी रूप से ग़ज़ा से जुड़े समीकरण में पाकिस्तान की भूमिका को खारिज कर दिया, वहीं उन्होंने ग़ज़ा के लिए ट्रंप के समग्र शांति ढांचे की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र से बेहतर है, जिसे उन्होंने पक्षपाती करार दिया। अंतरराष्ट्रीय शांति-रक्षक बलों पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा: “हम क़तरियों को स्वीकार नहीं करेंगे, तुर्कों को भी नहीं… और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है… उन्होंने ग़ज़ा में जिहादी संगठन का काफ़ी समर्थन किया है, और हम उन पर ज़मीनी स्तर पर तैनाती के लिए भरोसा नहीं करेंगे।”
‘बोर्ड ऑफ पीस’ को ट्रंप ने औपचारिक रूप से अपने 20-सूत्रीय शांति-योजना के दूसरे चरण के हिस्से के रूप में पेश किया है, जिसका उद्देश्य ग़ज़ा संघर्ष को समाप्त करना है। रिपोर्टों के मुताबिक, यह बोर्ड ग़ज़ा से आगे भी वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए एक नए अंतरराष्ट्रीय तंत्र के रूप में काम करेगा। कई देश इसे संयुक्त राष्ट्र की जगह लेने (या उसे दरकिनार करने) की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
पाकिस्तान में विपक्ष की गोलबंदी
पाकिस्तान में, जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी ने इस चार्टर पर हस्ताक्षर करने के शरीफ सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ मोर्चा संभाला। कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) ने कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय शांति पहल में भागीदारी संयुक्त राष्ट्र की बहुपक्षीय प्रणाली की “पूरक और मज़बूत” होनी चाहिए, “न कि समानांतर ढांचे बनाने” वाली।
पार्टी ने इस फैसले पर राष्ट्रीय जनमत-संग्रह कराने की मांग की। फ़िलिस्तीनी जनता के प्रति समर्थन जताते हुए पार्टी ने कहा कि वह ऐसे किसी भी प्लान को स्वीकार नहीं करेगी जो ग़ज़ा या समूचे फ़िलिस्तीन की जनता की इच्छाओं के ख़िलाफ़ हो।
शहबाज़ शरीफ पर दबाव बढ़ाते हुए, मजलिस वहदत-ए-मुस्लिमीन (एमडब्ल्यूएम) के प्रमुख और पाक सीनेट में विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने इस हस्ताक्षर को “नैतिक रूप से ग़लत और अक्षम्य” करार दिया।
ट्रंप के साथ कौन-कौन है?
हालाँकि ट्रंप प्रशासन ने भारत और चीन जैसी बड़ी ताक़तों सहित लगभग 60 देशों को आमंत्रित किया था, लेकिन अंततः दावोस में लॉन्च के दौरान 20 से भी कम देशों ने भाग लिया। जिन देशों ने हस्ताक्षर किए, वे ऐसे निकाय का हिस्सा बन रहे हैं जहाँ कथित तौर पर स्थायी सदस्यता की क़ीमत 1 अरब डॉलर बताई जा रही है।
अक्टूबर में, इज़राइल और हमास ने ट्रंप की शांति योजना पर सहमति जताई थी। अब तक ट्रंप के निमंत्रण को स्वीकार करने वाले देशों में अर्जेंटीना, अल्बानिया, आर्मेनिया, अज़रबैजान, बहरीन, बेलारूस, बुल्गारिया, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कज़ाख़िस्तान, कोसोवो, मोरक्को, मंगोलिया, पाकिस्तान, क़तर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। भारत को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन उसने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

