
Iran Unrest: ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका! कौन सा देश किसके साथ और किसके खिलाफ?
Iran Protest: ईरान इस समय अंदरूनी विरोध, बाहरी दबाव और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। दुनिया के बड़े देश ईरान के पक्ष में बोल तो रहे हैं, लेकिन लड़ने को तैयार कोई नहीं दिखता।
US Iran Conflict: तेहरान की सड़कों पर गुस्सा है, वॉशिंगटन की जुबान पर धमकी है और दुनिया भर की निगाहें एक बार फिर ईरान पर टिकी हैं। जिस देश में कभी अमेरिका ने सरकार गिराई थी, आज वही देश फिर बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। क्योंकि, यह चर्चा इन दिनों जोरों पर है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कई बार खुलकर कह चुके हैं कि ईरान में मौजूदा सत्ता को हटाया जाना चाहिए।
ईरान में सत्ता परिवर्तन का पुराना इतिहास
साल 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान में एक बड़ा तख्तापलट किया था। उस समय ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए थे। मोसादेग ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वे चाहते थे कि शाह की ताकत कम हो। इससे अमेरिका और ब्रिटेन नाराज हो गए और दोनों देशों ने मिलकर मोसादेग को हटाकर शाह पहलवी को सत्ता सौंप दी। यह पहला मौका था, जब अमेरिका ने किसी देश में शांति काल में सरकार गिराई थी। इसके बाद यह तरीका अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बनता चला गया।
1979 की इस्लामिक क्रांति और अमेरिका से दुश्मनी
1953 के तख्तापलट का नतीजा आखिरकार 1979 की इस्लामिक क्रांति के रूप में सामने आया। इस क्रांति में अमेरिका समर्थक शाह की सरकार गिर गई और आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में नई इस्लामिक सरकार बनी। खुमैनी, शाह के पश्चिमीकरण और अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता के सख्त विरोधी थे। यहीं से ईरान और अमेरिका के रिश्तों में गहरी कड़वाहट शुरू हुई, जो आज तक खत्म नहीं हुई है।
आज की स्थिति
अब एक बार फिर अमेरिका आयतुल्लाह खामेनेई के नेतृत्व वाली सरकार को हटाने की बात कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो दुनिया के दूसरे देश किसके साथ खड़े होंगे?
रूस का रुख
रूस और ईरान के रिश्ते हाल के वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं, खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद। ईरान ने रूस को ड्रोन और हथियार दिए। रूस ने ईरान के साथ आर्थिक और सैन्य सहयोग बढ़ाया। इसके बावजूद रूस, अमेरिका से सीधे टकराव से बचता रहा है। पिछली बार जब ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला हुआ, तब भी रूस ने केवल बयानबाजी की थी। रूस ने साफ कहा है कि ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से आम लोग परेशान हैं। बाहरी ताकतें विरोध-प्रदर्शनों का फायदा उठाकर ईरान को अस्थिर करना चाहती हैं। अमेरिका की सैन्य धमकियां पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। लेकिन साफ है कि रूस, ईरान के लिए युद्ध में नहीं उतरेगा।
चीन क्या करेगा?
चीन भी अमेरिका की धमकियों की आलोचना कर रहा है, लेकिन वह भी सीधे टकराव से दूर रहना चाहता है। चीन, ईरान का बड़ा आर्थिक साझेदार है। ईरान, चीन को तेल बेचता है। चीन, ईरान को सैन्य तकनीक देता है। लेकिन चीन साफ कर चुका है कि वह ईरान को कोई सुरक्षा गारंटी नहीं देगा। अमेरिका चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, इसलिए चीन शब्दों से आगे जाने के मूड में नहीं है।
जी-7 देशों का रुख
जी-7 देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा) ने ईरान की मौजूदा सरकार के खिलाफ बयान दिया है। इन देशों ने कहा है कि ईरान में प्रदर्शनकारियों पर ज़्यादा हिंसा हो रही है। लोगों की मौतें और गिरफ्तारियां चिंता का विषय हैं। अगर दमन जारी रहा तो नए प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। जी-7 खुलकर ईरानी सरकार की आलोचना कर रहा है।
इस्लामी देशों की प्रतिक्रिया
इस्लामी दुनिया इस मुद्दे पर एकजुट नहीं दिख रही है। अरब देशों की प्रतिक्रिया बहुत धीमी है। तुर्की ईरान के आंतरिक मामलों में दखल के खिलाफ है। तुर्की ने खासतौर पर इजराइल को चेतावनी दी है। कई अरब देश ईरान से पहले ही नाराज हैं, लेकिन वे यह भी डरते हैं कि अगर ईरान अस्थिर हुआ तो पूरा क्षेत्र अराजकता में डूब सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का डर
अरब देशों को सबसे बड़ा डर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यहां टकराव हुआ तो तेल सप्लाई रुक सकती है। इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल सकती है। इसी वजह से सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे देश चाहते हैं कि मामला युद्ध तक न पहुंचे।
ट्रंप का रुख
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, ट्रंप ने अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है। सभी सैन्य और गैर-सैन्य विकल्प खुले रखे गए हैं। वे अपने सलाहकारों के साथ लगातार चर्चा कर रहे हैं। ट्रंप ने हाल ही में ईरान के लोगों से अपील की कि वे विरोध जारी रखें और कहा कि मदद पहुंचाई जाएगी।

