
डॉलर की होगी रूस में वापसी? पुतिन ने ट्रंप को दिया 7 सूत्रीय ऑफर !
रूस फिर अपनाएगा अमेरिकी डॉलर? क्रेमलिन के 7 सूत्रीय गुप्त प्रस्ताव ने हिलाया वैश्विक बाजार; यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए ट्रंप को दिया बड़ा लालच, चीन की बढ़ी धड़कनें।
USA Russia Secret Deal : रूस और अमेरिका के बीच एक ऐसा गुप्त आर्थिक समझौता पक रहा है, जो वैश्विक राजनीति की पूरी बिसात पलट सकता है। ब्लूमबर्ग द्वारा समीक्षा किए गए क्रेमलिन के एक आंतरिक दस्तावेज (Internal Document) से सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि रूस फिर से 'अमेरिकी डॉलर' को अपनाने का मन बना रहा है। यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए चल रही बातचीत के बीच, पुतिन प्रशासन ने ट्रंप सरकार को एक 7 सूत्रीय प्रस्ताव (7-Point Proposal) भेजा है। इस प्रस्ताव का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा है रूस का फिर से डॉलर सेटलमेंट सिस्टम में लौटना। यह वही डॉलर है जिसे पुतिन पिछले कई सालों से 'हथियार' बताकर उसका विकल्प तलाश रहे थे। अगर यह डील परवान चढ़ती है, तो यह न केवल वैश्विक वित्त प्रणाली को हिला देगा, बल्कि रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियों पर भी लगाम लगा सकता है।
क्रेमलिन के प्रस्ताव के 7 'विस्फोटक' बिंदु
क्रेमलिन के इस गुप्त मेमो में उन क्षेत्रों का जिक्र है जहाँ रूस और अमेरिका के आर्थिक हित मिल सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
विमानन क्षेत्र: रूस के विमान बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए दीर्घकालिक अनुबंध और रूसी मैन्युफैक्चरिंग में अमेरिकी भागीदारी।
तेल और गैस: समुद्री (Offshore) तेल और एलएनजी (LNG) प्रोजेक्ट्स में संयुक्त निवेश, जिससे अमेरिकी कंपनियों को पुराने नुकसान की भरपाई का मौका मिले।
बाजार में वापसी: अमेरिकी कंपनियों को रूसी उपभोक्ता बाजार में लौटने के लिए तरजीही शर्तें।
परमाणु ऊर्जा: एआई (AI) और न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में मिलकर काम करना।
डॉलर की वापसी: रूसी ऊर्जा लेनदेन सहित सभी बड़े समझौतों के लिए डॉलर का इस्तेमाल।
कच्चा माल: लिथियम, तांबा, निकल और प्लैटिनम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग।
फॉसिल फ्यूल का प्रचार: चीन और यूरोप की 'ग्रीन एनर्जी' नीति के खिलाफ कच्चे तेल और गैस को बढ़ावा देना।
ट्रंप की 'जीत' या चीन के साथ 'धोखा'?
पुतिन का यह प्रस्ताव सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की विचारधारा को सूट करता है। ट्रंप हमेशा से तेल और गैस (Fossil Fuels) के समर्थक रहे हैं और पवन चक्कियों जैसी क्लीन एनर्जी के खिलाफ बोलते रहे हैं। क्रेमलिन का यह प्रस्ताव उसी 'एंटी-क्लाइमेट' एजेंडे को हवा दे रहा है। हालांकि, पश्चिमी अधिकारियों का मानना है कि पुतिन के लिए चीन का साथ छोड़ना इतना आसान नहीं होगा। युद्ध के दौरान चीन ही रूस का सबसे बड़ा मददगार रहा है। ऐसे में डॉलर की ओर वापस मुड़ना बीजिंग के हितों के खिलाफ जा सकता है। लेकिन अगर ट्रंप इसे स्वीकार करते हैं, तो यह उनकी एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जाएगी, क्योंकि इससे मॉस्को और बीजिंग के बीच दरार पैदा होगी।
'दिमित्रीव पैकेज' और जेलेंस्की का दावा
यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने भी हाल ही में पुष्टि की है कि रूस और अमेरिका के बीच शांति वार्ता के समानांतर बड़े आर्थिक समझौतों पर चर्चा हो रही है। जेलेंस्की ने इसे 'दिमित्रीव पैकेज' (Dmitriev Package) का नाम दिया है, जिसका नाम क्रेमलिन के वार्ताकार किरिल दिमित्रीव के नाम पर रखा गया है। दिमित्रीव रूस के सॉवरेन वेल्थ फंड के प्रमुख भी हैं। यूक्रेन की खुफिया एजेंसी ने इस आर्थिक ऑफर की पूरी जानकारी जुटा ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस डॉलर सिस्टम में लौटकर अपनी मुद्रा (रूबल) में अस्थिरता कम करना चाहता है, जबकि अमेरिका इसके जरिए डॉलर को दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में और मजबूत करना चाहता है।
क्या पुतिन फिर से वाशिंगटन के सामने झुकेंगे?
साल 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद अमेरिका ने डॉलर सिस्टम का इस्तेमाल कर रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। इसके जवाब में पुतिन ने भारत और चीन के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार शुरू किया था। अब फिर से डॉलर की शरण में जाना एक तरह से वाशिंगटन के वित्तीय प्रभुत्व को स्वीकार करना होगा। लेकिन इसके बदले में रूस को जो आर्थिक रियायतें और प्रतिबंधों से मुक्ति मिलेगी, वह पुतिन के लिए किसी 'लाइफलाइन' से कम नहीं होगी। अब सबकी नजरें ट्रंप प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या वे पुतिन के इस 'डॉलर वाले जाल' में फंसते हैं या यूक्रेन के यूरोपीय सहयोगियों के साथ खड़े रहते हैं।
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