
श्रीलंका: प्रांतीय चुनाव कराने में हिचक रही JVP सरकार, चिंता में तमिल
कोलंबो से मिल रहे संकेत बताते हैं कि सरकार शायद 1987 के भारत-श्रीलंका समझौता के तहत बने प्रांतीय परिषदों को धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है...
क्या श्रीलंका सरकार 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के तहत बने प्रांतीय परिषदों को चुपचाप खत्म करने की तैयारी कर रही है? कोलंबो से मिल रहे संकेत कुछ ऐसा ही इशारा करते हैं।
यह विवादास्पद द्विपक्षीय समझौता, जिसका उद्देश्य तमिल अलगाववाद को समाप्त करना था, श्रीलंका के सभी नौ प्रांतों में निर्वाचित परिषदों की स्थापना का प्रावधान करता था, ताकि स्थानीय स्तर पर सत्ता का विकेंद्रीकरण हो सके और विभिन्न क्षेत्रों का बेहतर विकास सुनिश्चित किया जा सके।
हालांकि इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य उस समय के संयुक्त तमिल-बहुल उत्तर-पूर्वी प्रांत में लोगों को अलगाववाद से दूर करना था, लेकिन बाद में पूरे द्वीपीय देश में प्रांतीय परिषदों की स्थापना की गई, जिससे राजनीतिक सक्रियता के एक नए स्तर का उदय हुआ।
क्या वादा टूट गया?
राष्ट्रपति अनुरा दिसानायके के नेतृत्व वाली सरकार ने 2024 में वादा किया था कि सत्ता में आने के बाद एक साल के भीतर प्रांतीय चुनाव कराए जाएंगे। लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है।
कोलंबो से टेलीफोन पर बातचीत में पूर्व मंत्री फैसज़र मुस्तफा ने कहा, “अगर सरकार की राजनीतिक इच्छा हो, तो अभी चुनाव कराए जा सकते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि पिछले लगभग एक दशक से सरकारें किसी न किसी बहाने से चुनाव टालती रही हैं और बिना चुने गए राज्यपालों के जरिए परिषदों को नियंत्रित करती रही हैं।
समिति ने समय सीमा और आगे बढ़ाई
विदेश मंत्री विजिता हेराथ ने बताया कि संसद की एक समिति, जिसे तीन महीने में रिपोर्ट देनी थी, अब केवल प्रारंभिक रिपोर्ट पेश करेगी। इसका मतलब है कि प्रक्रिया और आगे खिंचेगी और कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं है।
यह समिति 7 अप्रैल को अटॉर्नी जनरल और चुनाव आयोग से प्रांतीय चुनावों और भारत समर्थित 13वें संविधान संशोधन के पूर्ण कार्यान्वयन पर चर्चा करेगी। हालांकि किसी ठोस नतीजे की उम्मीद कम ही है।
एक पूर्व मंत्री के अनुसार, सरकार को आशंका है कि वह नौ में से चार-पांच प्रांतीय परिषदों में हार सकती है, खासकर तमिल-बहुल उत्तर और बहु-जातीय पूर्वी क्षेत्रों में। ऐसी स्थिति सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है।
JVP की वैचारिक आपत्ति
सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व कर रही Janatha Vimukthi Peramuna (JVP) शुरू से ही प्रांतीय परिषदों के खिलाफ रही है और 1987 के समझौते को भारत द्वारा थोपा गया मानती है। हालांकि सत्ता में आने से पहले और तमिल वोट हासिल करने के लिए उसने चुनाव कराने का वादा किया था।
चुनावी झटके के बाद बदली रणनीति
पिछले साल आम चुनाव के कुछ महीनों बाद हुए स्थानीय निकाय चुनावों में गठबंधन को लगभग 18 लाख वोटों का नुकसान हुआ, जिससे उसकी रणनीति बदल गई। एक पूर्व मंत्री के अनुसार, “यही मुख्य कारण है कि अब JVP प्रांतीय चुनावों से बच रही है।”
परिषद निष्क्रिय, राज्यपाल सक्रिय
साल 2017-18 के बाद से श्रीलंका में कोई भी प्रांतीय परिषद निर्वाचित नहीं है। इन परिषदों की शक्तियां अब कोलंबो द्वारा नियुक्त राज्यपालों के पास हैं, जिससे इन संस्थाओं के मूल उद्देश्य पर सवाल उठता है। प्रांतीय परिषदों को स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि जैसे क्षेत्रों में कानून बनाने का अधिकार होता है।
तमिल समुदाय की चिंता
लंदन स्थित विश्लेषक शंतन के. थम्बैयाह के अनुसार, “अगर चुनाव नहीं होते हैं, तो यह तमिल समुदाय की आकांक्षाओं के लिए बड़ा झटका होगा।”
उन्होंने कहा कि सीमित ही सही, लेकिन प्रांतों को अधिकार देना लंबे समय में देश को मजबूत करता है, जैसा भारत में देखा गया है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं
एक पूर्व राजनयिक के अनुसार, भारत और पश्चिमी देश JVP सरकार पर ज्यादा दबाव नहीं बना रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि ऐसा करने से श्रीलंका चीन के और करीब जा सकता है। उन्होंने कहा, “इस सरकार पर कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं है, और यह स्थिति JVP के लिए अनुकूल है।”
चुनाव टालने के कारण
सरकार का कहना है कि पिछले साल आए चक्रवात से हुई तबाही, खाड़ी क्षेत्र में चल रहा युद्ध और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों के कारण चुनाव कराना फिलहाल संभव नहीं है।
भविष्य अनिश्चित
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के संकेत बताते हैं कि 2027 तक भी प्रांतीय चुनाव नहीं कराए जा सकते। गौरतलब है कि 1988 में श्रीलंका में पहली बार प्रांतीय चुनाव हुए थे, जब भारतीय सेना उत्तर-पूर्व में तैनात थी। बाद में 1990 में उत्तर-पूर्वी परिषद को भंग कर दिया गया और क्षेत्र को अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों में बांट दिया गया।
इन परिषदों ने कई बड़े नेताओं को जन्म दिया, जिनमें Chandrika Kumaratunga प्रमुख हैं, जो पश्चिमी प्रांत की मुख्यमंत्री रहीं और बाद में श्रीलंका की राष्ट्रपति बनीं।

