भारत–पाकिस्तान विवाद किसने किया खत्म? दुनिया क्यों लेना चाहती है इसका श्रेय?
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भारत–पाकिस्तान विवाद किसने किया खत्म? दुनिया क्यों लेना चाहती है इसका श्रेय?

भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण न हो। यह विवाद पहलगाम आतंकी हमला और पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की भारत पर कार्रवाई के बाद शुरू हुआ।


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पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुए विवाद को खत्म करने में अमेरिका और चीन ने अपना रोल बताया है। लेकिन भारत लगातार तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को नकार रहा है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति और क्षेत्रीय कूटनीति पर इन दावों का क्या असर होगा, इसे समझने के लिए 'The Federal' के कंसल्टिंग एडिटर केएस दक्षिणामूर्ति से बातचीत की गई।

अमेरिका और चीन क्यों कर रहे दावा?

पिछले सात महीनों में डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार कहा कि अमेरिका ने भारत–पाकिस्तान विवाद को खत्म करने में मदद की। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने 60 से अधिक बार यह दावा किया। ट्रंप के इस कदम को उनके दूसरे कार्यकाल की तैयारी के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें वे खुद को शांति निर्माता के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। ट्रंप ने इससे पहले भी इजराइल–फिलिस्तीन, अजरबैजान–आर्मेनिया और थाईलैंड–कंबोडिया जैसे कई अंतरराष्ट्रीय विवादों में हस्तक्षेप का दावा किया। यह पैटर्न अमेरिका को एक निर्णायक वैश्विक मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाता है।

चीन का ऐसा दावा और भी दिलचस्प है। बीजिंग ने केवल भारत–पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रखा। चीन ने ईरान, इजराइल, इजराइल–फिलिस्तीनी विवाद और थाईलैंड–कंबोडिया में भी हस्तक्षेप का दावा किया। ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें ट्रंप भी अपना दावा कर चुके हैं। इससे यह संभावना पैदा होती है कि अमेरिका और चीन के बीच शक्ति प्रदर्शन हो रहा है। दोनों देशों ने संभवतः एक ही समय पर मध्यस्थता नहीं की होगी। चीन की अचानक सक्रियता यह संकेत देती है कि अब वह अमेरिका के कूटनीतिक दावों पर चुप नहीं रहना चाहता।


क्या ये दावे विश्वसनीय हैं?

इतिहास में अमेरिका ने भारत–पाकिस्तान तनाव के समय कई बार हस्तक्षेप किया है। जैसे कि बिल क्लिंटन और जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में। इसलिए अमेरिका के दावों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। चीन का दावा जटिल है। पाकिस्तान के साथ चीन का गहरा सैन्य और कूटनीतिक तालमेल है। पाकिस्तान के अधिकांश हथियार चीन से आते हैं। इसलिए चीन अप्रत्यक्ष रूप से इस विवाद में शामिल था। हालांकि, भारत के लिए चीन की तटस्थ मध्यस्थता समझना कठिन है। चीन को पाकिस्तान के साथ तालमेल रखते हुए भारत को समझौता करने की सलाह भी देनी होती। इससे स्थिति में अस्पष्टता और भ्रम पैदा होता है।

भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता क्यों नकारा?

भारत का यह रुख कश्मीर को लेकर संवेदनशीलता से तय होता है। भारत हमेशा कहता रहा है कि कश्मीर से जुड़े मुद्दे द्विपक्षीय रूप से ही सुलझाए जाएं, बिना किसी तीसरे पक्ष की भागीदारी के। यूएस और चीन का दावा सिर्फ विवाद समाप्त करने की मध्यस्थता का है, कश्मीर मुद्दे पर नहीं। भारत के लिए यह जरूरी है कि मध्यस्थता स्वीकार करना किसी तरह कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण न बन जाए।

चीन ने क्यों दिखाई सक्रियता?

चीन अमेरिका के साथ कूटनीति और वैश्विक प्रभाव के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर रहा है। जब चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने चीन की कथित भूमिका बताई तो यह संकेत था कि चीन दक्षिण एशिया में प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। पिछले दो दशकों में चीन ने भारत के पड़ोसी देशों में अपने प्रभाव को बढ़ाया है – जैसे श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान के साथ बेहद करीबी रिश्ते बनाए हैं। मध्यस्थता का दावा करके चीन यह संदेश देना चाहता है कि क्षेत्रीय निर्णयों में उसका निर्णायक योगदान है और वह अमेरिका के बराबर वैश्विक शक्ति के रूप में खुद को स्थापित करना चाहता है।

विवाद एक सप्ताह से भी कम चला और अचानक समाप्त हो गया। भारत का रुख है कि विवाद पाकिस्तान के अनुरोध के बाद और भारत के स्वतंत्र निर्णय से समाप्त हुआ। पाकिस्तान बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार करने में कम हिचकिचाता है। उसने अमेरिका, चीन और सऊदी अरब का धन्यवाद किया। भारत के विपरीत पाकिस्तान का यह रवैया आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि उसका चीन के साथ नजदीक तालमेल है। कूटनीति में अक्सर पड़ोसी देशों के बीच तनाव होने पर क्षेत्रीय शक्तियां मध्यस्थता की कोशिश करती हैं। भारत–पाकिस्तान मामले में भी संभव है कि अमेरिका, सऊदी अरब और चीन ने कुछ बैक-चैनल संवाद किया हो। भारत का रुख स्पष्ट है कि विवाद समाप्त करने का निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया गया।

मध्यस्थता का महत्व

भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण न हो। यह विवाद पहलगाम आतंकी हमला और पाकिस्तान समर्थित आतंकियों की भारत पर कार्रवाई के बाद शुरू हुआ। भारत की प्रतिक्रिया प्रतिशोध पर आधारित थी, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप नहीं। वैश्विक राजनीति में मध्यस्थता लगातार बढ़ती जा रही है। उदाहरण के लिए रूस–यूक्रेन संघर्ष में ट्रंप जैसे नेताओं ने व्यक्तिगत रूप से मध्यस्थता की कोशिश की। दक्षिण-पूर्व एशिया में ASEAN ने कंबोडिया–थाईलैंड तनाव में भूमिका निभाई। ये उदाहरण दिखाते हैं कि विवाद और मध्यस्थता अक्सर साथ-साथ होते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत–पाकिस्तान मामले में अमेरिका और चीन के दावों को समझना महत्वपूर्ण है।

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