
मादुरो को पकड़ने का अमेरिकी दावा: सत्ता परिवर्तन की खतरनाक राजनीति की वापसी के संकेत
विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला पर यह कार्रवाई संकेत देती है कि लैटिन अमेरिका एक बार फिर अमेरिकी दबाव और दखल के दौर में प्रवेश कर चुका है। आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को सोशल मीडिया पर एक चौंकाने वाला दावा किया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेनाओं ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी प्रथम महिला सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है। इस बयान के बाद पूरे लैटिन अमेरिका में भारी नाराजगी और चिंता देखने को मिल रही है। इस घटनाक्रम को वॉशिंगटन और कराकस के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव में एक बड़ा और खतरनाक मोड़ माना जा रहा है। साथ ही, इससे राष्ट्रीय संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और अमेरिका की दखलअंदाजी की नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
द फेडरल के कंसल्टिंग एडिटर केएस दक्षिणा मूर्ति के मुताबिक, सबसे पहले तो ‘कैप्चर’ यानी पकड़ने शब्द का इस्तेमाल ही बेहद आपत्तिजनक है। वेनेजुएला एक संप्रभु देश है। किसी भी देश को—यहां तक कि अमेरिका को भी किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति को पकड़ने का अधिकार नहीं है। निकोलस मादुरो एक निर्वाचित और वैध राष्ट्रपति हैं, कोई अपराधी नहीं, जिन्हें इस तरह पकड़ा जाए। इसलिए यह दावा अपने आप में अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करता है।
लैटिन अमेरिका में विरोध
लैटिन अमेरिका के कई देशों ने अमेरिका की इस कार्रवाई पर आपत्ति जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह अमेरिका की वही पुरानी नीति है, जिसमें वह क्षेत्र में किसी भी तरह के विरोध को बर्दाश्त नहीं करता। दक्षिणा मूर्ति का कहना है कि यह मामला नया नहीं है। ह्यूगो चावेज के समय से ही अमेरिका वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन की कोशिश करता रहा है, लेकिन हर बार असफल रहा। मौजूदा कदम उसी श्रृंखला की अब तक की सबसे खुली और आक्रामक कोशिश मानी जा रही है।
ड्रग तस्करी सिर्फ बहाना
अमेरिका ने इस कार्रवाई को ड्रग तस्करी से जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन विशेषज्ञ इसे महज एक बहाना मानते हैं। दक्षिणा मूर्ति के अनुसार, ड्रग तस्करी कोई नई समस्या नहीं है। दशकों से पूरे लैटिन अमेरिका में कार्टेल सक्रिय हैं। इसका यह मतलब नहीं कि कोई देश दूसरे देश पर हमला कर दे। उन्होंने कहा कि असल मकसद सरकार बदलना है। हाल के हफ्तों में वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाना भी इसी बड़े राजनीतिक दबाव का हिस्सा माना जा रहा है।
बातचीत के संकेत, फिर भी हमला
विशेषज्ञों के मुताबिक, हाल के दिनों में मादुरो को संकेत मिल गए थे कि अमेरिका कोई बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। उन्होंने बातचीत की पेशकश भी की थी और यह तक कहा था कि ट्रंप ने उन्हें राष्ट्रपति के रूप में मान्यता दी है। लेकिन इसके बावजूद अमेरिका ने सीधा हमला किया, जिससे साफ हो गया कि मामला सिर्फ बातचीत या ड्रग्स का नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की रणनीति का है।
अमेरिका का लंबा हस्तक्षेप का इतिहास
अमेरिका का लैटिन अमेरिका में दखल कोई नई बात नहीं है। 1973 में चिली में लोकतांत्रिक राष्ट्रपति साल्वाडोर आयेंदे को हटाकर तानाशाह पिनोशे को सत्ता में लाया गया। ग्रेनेडा पर सीधा सैन्य हमला और निकारागुआ में अप्रत्यक्ष युद्ध। दक्षिणा मूर्ति के अनुसार, क्यूबा ही एकमात्र देश रहा है, जिसने दशकों तक अमेरिकी दबाव का सामना किया और टिके रहा।
संयुक्त राष्ट्र बेबस साबित
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ हो गया है कि संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद ऐसे मामलों में पूरी तरह बेअसर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून या वैश्विक सहमति की परवाह किए बिना अपने फैसले थोपता है। यही रवैया अब दूसरे देशों, जैसे ईरान के लिए भी चेतावनी बन रहा है।
यूरोप का समर्थन
यूरोपीय संघ (EU) अमेरिका का करीबी सहयोगी है और इस मुद्दे पर वह मोटे तौर पर वॉशिंगटन के साथ खड़ा दिखता है। हालांकि EU हालात की “समीक्षा” की बात करता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसके पास अमेरिका को रोकने की कोई ठोस ताकत नहीं है।

