अमेरिका-ईरान सीजफायर के पीछे बड़ा खेल? परमाणु विवाद से फिर बढ़ा तनाव
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अमेरिका-ईरान सीजफायर के पीछे बड़ा खेल? परमाणु विवाद से फिर बढ़ा तनाव

अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बावजूद तनाव खत्म नहीं हुआ है। ट्रंप के 15-सूत्रीय प्लान और ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।


ईरान और अमेरिका के बीच दो सप्ताह के संघर्ष विराम (सीजफायर) पर सहमति बनने के बावजूद कूटनीतिक तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। दोनों देश इस समझौते को अपनी-अपनी जीत के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन इसके समानांतर परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक बड़ा विवाद उभरकर सामने आया है।

दरअसल, यह विवाद डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के 15-सूत्रीय प्रस्ताव और ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के बीच फंसी कूटनीति से जुड़ा है, जिसने पूरे समझौते को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। खासकर ईरान के प्रस्ताव की भाषा को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के दो अलग-अलग संस्करण सामने आए हैं। फारसी भाषा में जारी दस्तावेज़ में साफ तौर पर यह मांग की गई है कि अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को मान्यता दे। वहीं, इसी प्रस्ताव के अंग्रेजी अनुवाद में इस अहम हिस्से को हटा दिया गया है। इसे रणनीतिक अस्पष्टता के तौर पर देखा जा रहा है—जहां ईरान घरेलू स्तर पर अपने समर्थकों को मजबूत संदेश देना चाहता है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंच पर लचीलापन बनाए रखना चाहता है।

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पेश 15-सूत्रीय मसौदे में ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों—नातांज, फोर्डो और इस्फहान—को निष्क्रिय करने की मांग शामिल है। इसके साथ ही International Atomic Energy Agency (IAEA) द्वारा कड़ी और लगातार निगरानी की शर्त रखी गई है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि समृद्ध यूरेनियम के भंडार को या तो देश से बाहर भेजा जाए या IAEA के नियंत्रण में दिया जाए।

इसके अलावा, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने और क्षेत्रीय संगठनों जैसे हिजबुल्लाह और हूतियों को हथियार व वित्तीय सहायता बंद करने की भी शर्तें रखी गई हैं। बदले में अमेरिका ने संकेत दिया है कि यदि ईरान इन शर्तों को मान लेता है, तो उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं और उसे नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में सहयोग दिया जाएगा।

इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “पूर्ण और संपूर्ण जीत” बताया। AFP को दिए इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि समझौते में कोई अस्पष्टता नहीं है और यदि यूरेनियम संवर्धन का मुद्दा हल नहीं हुआ होता, तो वे इस समझौते के लिए तैयार ही नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि सैटेलाइट के जरिए ईरान की गतिविधियों और यूरेनियम स्टॉक की निगरानी संभव है, और फिलहाल युद्ध रोकने के लिए यह समझौता जरूरी था।

वहीं, ईरान की मांगें केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं हैं। उसके 10-सूत्रीय प्रस्ताव में कई ऐसे बिंदु शामिल हैं, जो पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं। ईरान चाहता है कि Strait of Hormuz से गुजरने वाले हर जहाज पर 20 लाख डॉलर का शुल्क लगाया जाए, जिसे ओमान के साथ साझा कर युद्ध के बाद पुनर्निर्माण में इस्तेमाल किया जाए।

इसके साथ ही ईरान ने क्षेत्र से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी और अमेरिका द्वारा रोकी गई ईरानी संपत्तियों व फंड्स को तुरंत जारी करने की मांग भी रखी है। सीजफायर के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच यह कूटनीतिक टकराव अभी सुलझने से दूर नजर आ रहा है, और आने वाले समय में यह वैश्विक राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है।

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