
US पर गरजा ईरान 'परमाणु अधिकार हमारे अस्तित्व की लड़ाई' नहीं छोड़ेंगे
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने घोषणा की है कि ईरान की परमाणु शक्ति उसकी संप्रभुता का हिस्सा है और इससे किसी भी कीमत पर समझौता संभव नहीं है...
वाशिंगटन के '20 वर्षीय संवर्धन रोक' के प्रस्ताव को ठुकराते हुए ईरान के 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (IRGC) ने कड़ा रुख अपनाया है। राष्ट्रपति ट्रंप की नाकाबंदी और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी परमाणु शक्ति का सौदा नहीं करेगा।
ईरान के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली सैन्य संगठन, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने उन सभी कयासों पर विराम लगा दिया है, जिनमें कहा जा रहा था कि तेहरान दबाव में आकर अपने परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार कम कर सकता है। यूरेनियम संवर्धन की प्रक्रिया को लेकर अमेरिका के साथ चल रहे भीषण कूटनीतिक युद्ध के बीच IRGC के आधिकारिक प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघरी ने वैश्विक मंच पर ईरान के इरादे स्पष्ट कर दिए।
"ईरान द्वारा अपने परमाणु अधिकारों से पीछे हटने या संवर्धन कार्यक्रम को बंद करने की खबरें पूरी तरह से भ्रामक और पश्चिम का प्रोपेगेंडा हैं। हम अपनी संप्रभुता, राष्ट्रीय गरिमा और सामरिक शक्ति का बलिदान कभी नहीं देंगे, चाहे वह रक्षा का क्षेत्र हो या शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा का।"
Iran will abandon uranium enrichment are false. We will never give up our rights, sovereignty, or strength—on war or nuclear power. pic.twitter.com/X3Avq8IzMi
— Ebrahim Zolfaghari (@Irantimes01) April 14, 2026
समय सीमा का पेंच: 20 साल बनाम 'सिंगल डिजिट'
एक्सियोस (Axios) की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कई दिनों तक चली 'मैराथन वार्ता' के दौरान अमेरिका ने एक बड़ा कूटनीतिक दांव खेला था। वाशिंगटन ने प्रस्ताव दिया था कि यदि ईरान एक व्यापक और स्थायी समझौता चाहता है, तो उसे अगले 20 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन की सभी गतिविधियों पर पूर्ण विराम लगाना होगा।
ईरानी वार्ताकारों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'अमान्य' करार दिया। ईरान का तर्क है कि 20 साल की अवधि बहुत लंबी है और यह उनके विकास को बाधित करेगी। इसके बदले ईरान ने "सिंगल डिजिट" यानी 10 साल से भी कम की अवधि का विकल्प रखा है। सूत्रों का कहना है कि संवर्धित भंडार को नष्ट करने या उसे विदेशी धरती पर भेजने का मुद्दा ही वर्तमान में वार्ता की सफलता में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है।
यूरेनियम भंडार पर तकरार: 'डाउन-ब्लेंडिंग' का प्रस्ताव
अमेरिका की एक अन्य प्रमुख शर्त यह है कि ईरान अपने पास मौजूद 'हाईली एनरिच्ड यूरेनियम' (HEU) के पूरे भंडार को देश से बाहर किसी तीसरे देश में स्थानांतरित करे। वाशिंगटन को डर है कि यह भंडार किसी भी समय परमाणु हथियार बनाने के काम आ सकता है।
हालांकि, ईरान ने यहां थोड़ा लचीलापन दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने 'डाउन-ब्लेंडिंग' (Down-blending) का विकल्प दिया है। इस तकनीकी प्रक्रिया के तहत अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की मौजूदगी में यूरेनियम की सांद्रता को इतना कम कर दिया जाएगा कि वह सैन्य उपयोग के लायक न रहे। लेकिन अमेरिका इस प्रस्ताव को 'असुरक्षित' मान रहा है और उसका कहना है कि जब तक भंडार ईरान की धरती पर है, खतरा टला नहीं है।
जेडी वेंस का कड़ा रुख और बातचीत में बिखराव
पिछले हफ्ते तक कूटनीतिक गलियारों में यह उम्मीद थी कि एक 'अंतरिम समझौते' (Interim Deal) पर सहमति बन जाएगी। लेकिन रविवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के एक कड़े बयान ने पूरी स्थिति बदल दी। वेंस ने ईरान की हठधर्मिता की तीखी आलोचना की और अचानक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को इस्लामाबाद से वापस बुलाने का आदेश दे दिया।
इस घटनाक्रम पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने संकेत दिया कि वेंस और ट्रंप प्रशासन का मुख्य लक्ष्य केवल अस्थायी रोक नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ईरान दशकों तक परमाणु संवर्धन न कर सके और अपना पूरा परमाणु ढांचा खत्म करे।
ट्रंप का 'मैक्सिमम प्रेशर' और 21 अप्रैल की समय सीमा
इन तमाम तनावों के बीच, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी 'प्रेशर गेम' की रणनीति पर कायम हैं। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि व्हाइट हाउस को ईरान से कुछ संदेश मिले हैं, जिससे लगता है कि "वे समझौता करने के इच्छुक हैं।" लेकिन साथ ही, ट्रंप ने ईरान की समुद्री और आर्थिक नाकाबंदी की घोषणा कर दी है ताकि ईरान को वित्तीय रूप से कमजोर कर समझौते के लिए विवश किया जा सके।
अब पूरी दुनिया की निगाहें 21 अप्रैल, 2026 पर टिकी हैं। इसी दिन वर्तमान में जारी अस्थायी युद्धविराम (Ceasefire) की अवधि समाप्त हो रही है। यदि उससे पहले कोई ठोस समाधान नहीं निकलता, तो मध्य पूर्व में एक नया और विनाशकारी सैन्य संघर्ष शुरू होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कूटनीतिज्ञ अब भी पर्दे के पीछे से बातचीत को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिशों में जुटे हैं।

