ईरान-इजरायल टकराव गहराया, ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया वैश्विक खतरा
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ईरान-इजरायल टकराव गहराया, ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया वैश्विक खतरा

अमेरिका-इजरायल के हमले और ईरान की जवाबी कार्रवाई से पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा, होर्मुज संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों और भारत की महंगाई पर असर संभव।


अमेरिका और इजरायल ने हवाई और समुद्री मार्गों के जरिए ईरान पर हमला किया। अब इस जंग में ईरान की तरफ से भी जवाब दिया जा रहा है। वैश्विक स्तर पर नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने रंग दिखा दिया है। अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप के बयान कि किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने दिया जाएगा। इसके बाद यह लड़ाई अपने चरम पर जा सकती है। ईरान की ओर से इजरायल पर जवाबी कार्रवाई ने संघर्ष को द्विपक्षीय सीमा से बाहर निकालकर क्षेत्रीय अस्थिरता का रूप दे दिया है। इस परिदृश्य का सबसे संवेदनशील प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार विशेषकर कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य

Strait of Hormuz विश्व का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा चोकपॉइंट माना जाता है।वैश्विक कच्चे तेल व्यापार का लगभग 20% इस संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। प्रतिदिन अनुमानतः 14–16 मिलियन बैरल कच्चा तेल तथा 5–6 मिलियन बैरल पेट्रोलियम उत्पाद इसी मार्ग से परिवाहित होते हैं। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और कतर जैसे खाड़ी निर्यातक देशों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से एशियाई बाजारों—विशेषकर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया—तक पहुंचता है।

यद्यपि कुछ पाइपलाइनें इस मार्ग को आंशिक रूप से बायपास करती हैं, उनकी क्षमता संभावित बड़े व्यवधान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। अतः यदि ईरान इस जलमार्ग को अवरुद्ध करता है या सैन्य गतिविधि बढ़ती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति में गंभीर बाधा आ सकती है।

भारत की ऊर्जा निर्भरता और जोखिम

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85–90% आयात करता है, जिससे वह वैश्विक मूल्य अस्थिरता के प्रति अत्यंत संवेदनशील बन जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल तेल आयात का लगभग 50% हिस्सा सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से होर्मुज मार्ग पर निर्भर है। हाल के समय में भारत ने खाड़ी देशों से लगभग 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन (एमबीपीडी) तेल आयात किया है। यह दर्शाता है कि खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

यदि आपूर्ति बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि संभव है। आयात बिल में उल्लेखनीय वृद्धि से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है।

महंगाई का दबाव

तेल कीमतों में वृद्धि का प्रत्यक्ष प्रभाव, पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वृद्धि, परिवहन लागत में इजाफा, खाद्य एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर दबाव और व्यापक महंगाई (Inflationary Spiral) की आशंका है।

लॉजिस्टिक्स और बीमा लागत

अमेरिका स्थित ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, 2024 में होर्मुज मार्ग से गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा वैश्विक खपत से जुड़ा रहा। किसी भी प्रकार की सैन्य बाधा से शिपिंग बीमा प्रीमियम बढ़ेंगे, माल ढुलाई महंगी होगी, आपूर्ति समय में विलंब संभव होगा। इन सभी कारकों से भारत का प्रभावी आयात लागत और बढ़ सकती है।

भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया

ऊर्जा जोखिम को कम करने के लिए भारत ने हाल के वर्षों में आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाई है। वर्तमान में भारत रूस, इराक, सऊदी अरब, यूएई, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कुवैत, मैक्सिको, यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और कनाडा सहित अनेक क्षेत्रों से तेल आयात कर रहा है।हालांकि यह रणनीति जोखिम को आंशिक रूप से संतुलित करती है, फिर भी भौगोलिक और समुद्री मार्गों की बाध्यता के कारण होर्मुज का महत्व कम नहीं होता।

पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए एक संरचनात्मक जोखिम है। यदि Strait of Hormuz में व्यवधान उत्पन्न होता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि,भारत के आयात बिल और महंगाई में उछाल। ऐसी स्थिति में ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता, रणनीतिक भंडार का उपयोग, और कूटनीतिक समाधान तीनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण होंगे।

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