ट्रंप के टैरिफ पर US सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारत के लिए क्या मायने है?
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ट्रंप के टैरिफ पर US सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारत के लिए क्या मायने है?

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ रद्द करने के बाद पूर्व राजदूत मीरा शंकर ने बताया कि भारत के लिए अब 'वेट एंड वॉच' की नीति अपनाना क्यों जरूरी है।


Capital Beat : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापारिक नीतियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी 'रेसिप्रोकल टैरिफ' को पूरी तरह रद्द कर दिया है। इस ऐतिहासिक फैसले ने भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में नया मोड़ ला दिया है। 'द फेडरल' के कार्यक्रम 'कैपिटल बीट' में पूर्व राजदूत मीरा शंकर ने इस पर बात की। उन्होंने इस पूरे मामले का बहुत ही गहरा और तकनीकी विश्लेषण साझा किया है। उनके अनुसार अब भारत के पास व्यापारिक मेज पर मोलभाव का एक बड़ा मौका है। भारत को अमेरिका के साथ चल रहे समझौतों पर अब फिर से विचार करना होगा। इस समय भारत को किसी भी तरह की जल्दबाजी दिखाने से बचना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कानूनी आधार और एमएफएन टैरिफ
मीरा शंकर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत के लिए बड़ी राहत है। अब व्यापारिक शुल्क वापस पुराने एमएफएन (Most Favoured Nation) स्तर पर लौट आएंगे। अमेरिका का औसत एमएफएन टैरिफ इस समय करीब 3 प्रतिशत के आसपास रहता है। ट्रंप ने अब सेक्शन 122 के तहत 10% का नया वैश्विक टैरिफ लगा दिया है। यह नया शुल्क पुराने एमएफएन शुल्क के ऊपर अलग से लागू किया जाएगा। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रंप ने शक्तियों का अतिक्रमण किया। उन्होंने आपातकालीन आर्थिक शक्तियों का इस्तेमाल गलत तरीके से किया था। जजों ने इसे राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर का कदम माना है।

भारत के पास क्या विकल्प हैं और 'वेट एंड वॉच' की नीति
भारत ने अभी तक अमेरिका के साथ किसी अंतिम समझौते पर दस्तखत नहीं किए हैं। हमारे पास केवल एक फ्रेमवर्क या शुरुआती समझ का मसौदा ही मौजूद था। मीरा शंकर का कहना है कि भारत को अब 'देखो और इंतजार करो' की नीति अपनानी चाहिए। भारतीय व्यापार टीम इस समय वाशिंगटन में बातचीत के लिए मौजूद है। उन्हें वापस आकर भारत के कानूनी विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करना चाहिए। भारत के राजनीतिक नेतृत्व को भी इस नए मोड़ पर गंभीरता से सोचना होगा। किसी भी अधूरे समझौते पर साइन करना भारत के हितों के लिए ठीक नहीं होगा। अभी इंतजार करना ही भारत की सबसे बेहतर कूटनीतिक चाल हो सकती है।

अमेरिका का अगला कदम और कानूनी सीमाओं का जाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ट्रंप ने अपनी तय सीमा से बाहर जाकर काम किया। अब ट्रंप प्रशासन अमेरिकी व्यापार कानून की दूसरी धाराओं की तलाश कर रहा है। इसमें सेक्शन 122, 301 और 232 जैसे कई प्रावधान शामिल हो सकते हैं। लेकिन इन सभी धाराओं की अपनी कुछ सख्त सीमाएं और प्रक्रियाएं होती हैं। सेक्शन 122 के तहत राष्ट्रपति अधिकतम 15% शुल्क ही लगा सकते हैं। यह शुल्क भी केवल 150 दिनों की अवधि के लिए ही लगाया जा सकता है। सेक्शन 301 के लिए पहले एक लंबी जांच प्रक्रिया को पूरा करना अनिवार्य होता है। इसमें यह साबित करना होता है कि व्यापार में अनुचित व्यवहार हुआ है। इसलिए ट्रंप अब तुरंत कोई भारी शुल्क थोपने की स्थिति में नहीं हैं।

विपक्ष के आरोप और भारत की बातचीत की रणनीति
विपक्ष का आरोप है कि भारत ने समझौते में बहुत ज्यादा जल्दबाजी दिखाई है। वे कह रहे हैं कि भारत को अमेरिकी अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए था। मीरा शंकर ने इस पर कहा कि भारत ने काफी लंबे समय तक संयम बरता। वियतनाम जैसे देशों ने बहुत पहले ही अमेरिका के साथ असमान सौदे कर लिए थे। चीन को छोड़कर भारत ही वह देश था जिसने सबसे ज्यादा इंतजार किया। अब चूंकि कोई अंतिम लिखित समझौता नहीं हुआ है इसलिए भारत मोलभाव कर सकता है। भारत कह सकता है कि नई कानूनी स्थिति के कारण उसे समीक्षा की जरूरत है। ट्रंप का यह कहना कि भारत टैरिफ देगा अभी केवल चुनावी बयानबाजी है।

समझौते की रूपरेखा और ट्रंप का राजनीतिक रुख
ट्रंप उसी फ्रेमवर्क की बात कर रहे हैं जिस पर पहले बातचीत हुई थी। उस समझ के अनुसार भारतीय निर्यात पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात थी। इसके बदले में भारत को अमेरिकी उत्पादों पर ड्यूटी कम करनी थी। ट्रंप को लगता है कि अदालत के फैसले के बाद भी यह डील जारी रहेगी। लेकिन भारत के लिए अब इसके परिणामों पर फिर से विचार करना जरूरी है। रेसिप्रोकल टैरिफ का कानूनी आधार अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है। जब तक नया द्विपक्षीय समझौता नहीं होता तब तक पुराने भारी शुल्क नहीं लगेंगे। भारत को अब दुनिया के अन्य व्यापारिक साझेदारों के रुख पर भी नजर रखनी होगी। यह समय भारत के लिए अपनी शर्तों को और अधिक मजबूत करने का है।

डब्ल्यूटीओ और भविष्य की व्यापारिक चुनौतियां
क्या भारत इस मामले को लेकर डब्ल्यूटीओ (WTO) के पास जा सकता है? मीरा शंकर के अनुसार डब्ल्यूटीओ का तंत्र इस समय बहुत प्रभावी नहीं है। अमेरिका ने लंबे समय से इसके अपीलीय निकाय में नियुक्तियों को रोका हुआ है। इसलिए वहां से तुरंत राहत मिलने की उम्मीद काफी कम दिखाई देती है। हालांकि अगर कई देश मिलकर अमेरिका को चुनौती दें तो बात अलग है। भारत ने अतीत में भी डब्ल्यूटीओ के मंच का इस्तेमाल किया है। लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में इसका परिणाम अनिश्चित ही रहने वाला है। यथार्थवादी दृष्टिकोण से भारत को अमेरिका के अगले कदमों का इंतजार करना चाहिए।

भारत को सब्र के साथ रखना होगा अगला कदम
भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक शक्तियों का अंतर हमेशा बना रहेगा। बातचीत के दौरान भारत को अपनी सापेक्ष ताकत का पूरा अहसास होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत को एक मजबूत कानूनी जगह प्रदान करता है। इससे भारत को अपनी व्यापारिक शर्तों को मजबूती से रखने का मौका मिला है। ट्रंप प्रशासन अब कांग्रेस के जरिए टैरिफ लगाने की कोशिश कर सकता है। अगर कांग्रेस इसे मंजूरी देती है तो इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। लेकिन इसके लिए अमेरिका के भीतर ही काफी लंबी बहस और असहमति होगी। भारत के लिए सबसे विवेकपूर्ण रास्ता यही है कि वह अभी रुककर इंतजार करे।



(ऊपर दिया गया कंटेंट एक फाइन-ट्यून्ड AI मॉडल का इस्तेमाल करके ट्रांसक्राइब किया गया है। एक्यूरेसी, क्वालिटी और एडिटोरियल इंटीग्रिटी पक्का करने के लिए, हम ह्यूमन-इन-द-लूप (HITL) प्रोसेस का इस्तेमाल करते हैं। जहाँ AI शुरुआती ड्राफ्ट बनाने में मदद करता है, वहीं हमारी अनुभवी एडिटोरियल टीम पब्लिकेशन से पहले कंटेंट को ध्यान से रिव्यू, एडिट और बेहतर बनाती है। द फेडरल में, हम भरोसेमंद और इनसाइटफुल जर्नलिज़्म देने के लिए AI की एफिशिएंसी को ह्यूमन एडिटर्स की एक्सपर्टीज़ के साथ मिलाते हैं।)

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