
क्या सच में खत्म हुआ टैरिफ युद्ध? जानें क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक बताते हुए रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि शुल्क लगाने का अधिकार कांग्रेस को है, ट्रंप ने नया 10% शुल्क घोषित किया।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि ट्रंप ने आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया। ट्रंप ने ट्रेडिंग पार्टनर्स पर व्यापक शुल्क लगाने के लिए इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का सहारा लिया था, जिसे कोर्ट ने अनुचित ठहराया।
यह फैसला ट्रंप की व्यापार नीति के लिए बड़ा संस्थागत झटका माना जा रहा है। हालांकि, फैसले के तुरंत बाद ट्रंप ने वैकल्पिक कानूनी प्रावधानों के तहत 10 प्रतिशत का नया वैश्विक शुल्क लगाने की घोषणा कर दी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भयानक बताते हुए न्यायाधीशों की आलोचना की। खास बात यह रही कि बहुमत में शामिल दो जज नील गोरसच और एमी कोनी बैरेट खुद ट्रंप द्वारा नियुक्त किए गए थे, जिससे उनकी नाराजगी और बढ़ती दिखी।
वॉशिंगटन डीसी स्थित वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार सीमा सिरोही ने कहा कि यह फैसला ट्रंप की टैरिफ नीति के लिए एक झटका जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनका टैरिफ अभियान खत्म हो गया है। उन्होंने कहा, “ट्रंप उस आपातकालीन कानून का उपयोग अब नहीं कर सकते जिसके जरिए वे वैश्विक टैरिफ लगा रहे थे, लेकिन व्यापार कानून की अन्य धाराएं उनके पास मौजूद हैं। वे अधिक जटिल होंगी, पर समान स्तर के टैरिफ फिर भी लगाए जा सकते हैं।
संवैधानिक शक्तियों का विभाजन
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट किया कि व्यापक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी संविधान के तहत कांग्रेस के पास है। हालांकि, सिरोही ने यह भी बताया कि कांग्रेस ने पहले ही कार्यपालिका और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय को पर्याप्त अधिकार सौंप रखे हैं। उदाहरण के लिए, ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत उन देशों के खिलाफ जांच शुरू की जा सकती है जो अमेरिकी हितों के खिलाफ भेदभाव करते हैं।
सिरोही के अनुसार, यह तकनीकी से ज्यादा राजनीतिक झटका है। उन्होंने कहा कि मिडटर्म चुनावों से पहले ट्रंप की अपनी पार्टी में भी असहजता के संकेत दिख रहे हैं। कुछ रिपब्लिकन सांसद टैरिफ मुद्दे पर उनसे दूरी बनाते नजर आए हैं, क्योंकि वे इस आक्रामक रुख से खुद को जोड़ना नहीं चाहते।
संभावित कानूनी विवाद
इस फैसले के बाद पहले से वसूले गए टैरिफ को लेकर भी कानूनी विवाद खड़ा हो सकता है। पिछले एक वर्ष में लगभग 133 से 170 अरब डॉलर के बीच टैरिफ वसूले गए हैं। कंपनियां रिफंड की मांग कर सकती हैं, जिससे कानूनी अनिश्चितता लंबी खिंच सकती है और राजनीतिक स्थिति जटिल हो सकती है।
बाजार की प्रतिक्रिया
वित्तीय बाजारों ने सतर्क प्रतिक्रिया दी। शेयर बाजार में हल्की सकारात्मकता दिखी, लेकिन डॉलर और बॉन्ड बाजार में अनिश्चितता बनी रही। सिरोही ने कहा, सावधानीपूर्ण आशावाद जरूर है, लेकिन आगे की दिशा को लेकर अभी भी काफी अनिश्चितता है।
भारत पर प्रभाव
इस फैसले का असर हालिया भारत-अमेरिका व्यापार समझौतों पर भी पड़ सकता है। दोनों देशों के बीच एक फ्रेमवर्क समझौते के तहत टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया था, लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद कुछ शुल्क प्रभावी रूप से शून्य हो गए हैं। हालांकि, स्टील पर लगाए गए टैरिफ अलग कानूनी प्रावधान के तहत जारी रहेंगे।
भारत में कुछ आलोचकों का मानना है कि नई दिल्ली को समझौते को अंतिम रूप देने से पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए था। वहीं ट्रंप का कहना है कि समझौता बरकरार है और भारत अमेरिका को टैरिफ दे रहा है, जबकि अमेरिकी निर्यातकों के लिए बाधाएं कम हुई हैं।
सिरोही के मुताबिक इस समय तस्वीर धुंधली है। उनका कहना है कि भारत दोबारा बातचीत की कोशिश कर सकता है, लेकिन प्रशासन की कानूनी रणनीति स्पष्ट होने में कुछ दिन या हफ्ते लग सकते हैं।
संस्थाओं पर भरोसा
कुल मिलाकर यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक साझेदार अमेरिका की नीतिगत स्थिरता पर सवाल उठा रहे थे। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया है कि टैरिफ संग्रह का कुल स्तर बरकरार रहेगा, जिससे यह साफ है कि प्रशासन अपनी व्यापार नीति को जारी रखने के पक्ष में है। सीमा सिरोही ने कहा, “यह फैसला दिखाता है कि अमेरिका की संस्थाएं खड़ी हो सकती हैं और अपनी संवैधानिक भूमिका निभा सकती हैं।

