
2001 के बाद कितने देशों पर बरसा अमेरिकी कहर? जानिए पूरी कहानी
ईरान पर डोनाल्ड ट्रंप के हमले ने 9/11 के बाद चली अमेरिकी युद्ध नीति को आगे बढ़ाया है। अमेरिका ने 2001 से आज की तारीख में 10 देशों में कार्रवाई की है जिसमें लाखों की मौत हुई है।
महंगे और नुकसानदेह विदेशी युद्धों से अमेरिका को बाहर रखने का वादा करने के बावजूद, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इज़राइल के साथ मिलकर ईरान पर बड़ा सैन्य हमला किया है। इस हमले में ईरान की शीर्ष नेतृत्व संरचना के साथ उसके परमाणु और मिसाइल ढांचे को निशाना बनाया गया।अपने पूर्ववर्तियों की तरह ट्रंप ने भी अमेरिका के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए सैन्य शक्ति पर भरोसा किया है। इस कदम ने उस लंबे पैटर्न को जारी रखा है, जिसने दो दशकों से अधिक समय तक अमेरिकी विदेश नीति को आकार दिया है।
11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन पर हुए आतंकी हमलों के बाद से अमेरिका ने कम से कम तीन बड़े युद्ध लड़े हैं। इसके अलावा ड्रोन हमलों और हवाई हमलों के जरिए उसने कम से कम 10 देशों में कई बार बमबारी की है। कई बार एक ही वर्ष में बार-बार। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2001 के बाद अमेरिका जिन देशों में बमबारी कर चुका है, उनकी संख्या व्यापक है। हालांकि इनमें सभी गुप्त या विशेष सैन्य अभियान शामिल नहीं हो सकते।
9/11 हमलों के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने आतंक के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की थी। यह एक वैश्विक सैन्य अभियान था, जिसने अमेरिकी विदेश नीति की दिशा बदल दी और कई देशों में युद्ध, हमले और एयर स्ट्राइक का सिलसिला शुरू किया।
ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स के विश्लेषण के मुताबिक, 2001 के बाद अमेरिकी नेतृत्व वाले युद्धों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इराक, सीरिया, यमन और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में सीधे तौर पर लगभग 9.4 लाख लोगों की मौत हुई है।इन आंकड़ों में वे अप्रत्यक्ष मौतें शामिल नहीं हैं, जो भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं या युद्धजनित बीमारियों तक पहुंच न होने के कारण हुईं।
2001 से मौजूदा समय तक अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक, यमन, पाकिस्तान, सोमालिया, लीबिया, सीरिया, वेनेजुएला, नाइजीरिया और ईरान को निशाना बनाया है।
2001-21 के दौरान अमेरिकी हमलों में अफगानिस्तान में दो लाख से अधिक लोगों की मौत हुई
2003-2021 के दौरान इराक में तीन लाख से अधिक की मौत
2014-2021 के दौरान सीरिया में ढाई लाख से अधिक की मौत
2002- 2021 के दौर में यमन में एक लाख से अधिक की मौत
सौजन्य- ब्राउन यूनिवर्सिटी वाटसन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स
आर्थिक लागत भी बेहद भारी रही है। अब तक लगभग 5.8 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए जा चुके हैं। इसके अलावा आने वाले 30 वर्षों में पूर्व सैनिकों (वेटरन्स) की देखभाल पर कम से कम 2.2 ट्रिलियन डॉलर और खर्च होने का अनुमान है। इस तरह 2001 के बाद से अमेरिकी युद्धों की कुल अनुमानित लागत लगभग 8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है।
अफगानिस्तान युद्ध (2001–2021)
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका की सबसे पहली और सीधी सैन्य प्रतिक्रिया अफगानिस्तान पर हमला थी। इसका उद्देश्य अल-कायदा को खत्म करना और तालिबान शासन को सत्ता से हटाना था।
7 अक्टूबर 2001 को अमेरिका ने ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम शुरू किया। शुरुआती हमले में अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं ने कुछ ही हफ्तों में तालिबान शासन को गिरा दिया। हालांकि इसके बाद तालिबान और अन्य सशस्त्र समूहों ने अमेरिकी और गठबंधन सेनाओं के खिलाफ लंबा प्रतिरोध शुरू कर दिया।
यह युद्ध आगे चलकर अमेरिका के इतिहास का सबसे लंबा सैन्य संघर्ष बन गया। यह चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल तक चला और लगभग 20 साल बाद 2021 में अमेरिकी सेना की अंतिम वापसी के साथ समाप्त हुआ। इसके तुरंत बाद तालिबान ने फिर से अफगानिस्तान पर नियंत्रण हासिल कर लिया।
ब्राउन यूनिवर्सिटी के कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के विश्लेषण के अनुसार इस युद्ध में सीधे तौर पर लगभग 2.41 लाख लोगों की मौत हुई। इसके अलावा भूख, बीमारियों और युद्ध से लगी चोटों के कारण सैकड़ों हजार नागरिकों की अप्रत्यक्ष मौतें भी हुईं।
इस युद्ध में अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों के कम से कम 3,586 सैनिक मारे गए। अनुमान है कि इस युद्ध पर अमेरिका ने लगभग 2.26 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए।
इराक युद्ध (2003–2011)
20 मार्च 2003 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने दूसरा बड़ा युद्ध शुरू किया, इस बार निशाना इराक था। अमेरिका ने दावा किया कि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास व्यापक विनाश के हथियार (Weapons of Mass Destruction) हैं। बाद में यह दावा गलत साबित हुआ।
1 मई 2003 को बुश ने यूएसएस अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत पर खड़े होकर मिशन अकंप्लिश्ड की घोषणा की और कहा कि इराक में बड़े सैन्य अभियान समाप्त हो गए हैं।
हालांकि इसके बाद के वर्षों में इराक हिंसा, विद्रोह और सत्ता के शून्य से जूझता रहा। इसी माहौल में चरमपंथी संगठन आईएसआईएल (ISIS) के उभरने का रास्ता भी तैयार हुआ। 2008 में अमेरिका ने इराक से अपने लड़ाकू सैनिकों को वापस बुलाने पर सहमति दी। यह प्रक्रिया 2011 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पूरी हुई।
ड्रोन युद्ध: पाकिस्तान, सोमालिया और यमन
हालांकि इन्हें औपचारिक युद्ध घोषित नहीं किया गया, लेकिन अमेरिका ने इन वर्षों में अपने हवाई और ड्रोन अभियानों का विस्तार भी किया।2000 के दशक के मध्य से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान के अफगान सीमा से लगे कबायली इलाकों में ड्रोन हमले शुरू किए। इनका लक्ष्य अल-कायदा और तालिबान के वे नेता थे जो वहां सक्रिय माने जाते थे। यह दूर से संचालित युद्ध रणनीति के विस्तार की शुरुआत थी।
राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों में पाकिस्तान में ड्रोन हमलों की संख्या काफी बढ़ गई।इसी दौरान अमेरिका ने सोमालिया में अल-कायदा से जुड़े संदिग्ध समूहों के खिलाफ हवाई हमले किए। बाद में उसने अल-शबाब से जुड़े लड़ाकों को भी निशाना बनाया, क्योंकि यह संगठन तेजी से मजबूत हो रहा था।यमन में भी अमेरिकी सेना ने अल-कायदा के नेताओं को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
लीबिया में हस्तक्षेप
2011 में लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ हुए विद्रोह के दौरान अमेरिका ने नाटो के नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में हिस्सा लिया।अमेरिकी सेना ने नो-फ्लाई ज़ोन लागू करने के लिए हवाई और मिसाइल हमले किए। अंततः गद्दाफी को सत्ता से हटा दिया गया और उनकी हत्या कर दी गई। हालांकि इसके बाद लीबिया लंबे समय तक अस्थिरता और गुटीय संघर्षों में फंस गया।
इराक और सीरिया में अभियान
2014 के बाद अमेरिका ने सीरिया के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया। इसका घोषित उद्देश्य आईएसआईएल को हराना था।
इराक में पहले से चल रहे अभियान को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका ने सीरिया में लगातार हवाई हमले किए और जमीनी स्तर पर स्थानीय सहयोगी बलों को समर्थन दिया।
इराक में अमेरिकी सेना ने इराकी सैनिकों को सलाह और समर्थन दिया, आईएसआईएल के बचे हुए लड़ाकों के खिलाफ अभियान चलाया और ईरान के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश की।इसी क्रम में 2020 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर किए गए एक हमले में ईरान के शीर्ष सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी गई, जिसने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया।

