
ईरान पर जमीनी हमले की आहट, अमेरिका के संभावित रास्तों पर दुनिया की नजर
ईरान पर अमेरिका के संभावित ज़मीनी हमले को लेकर वैश्विक चिंता बढ़ गई है। जमीनी हमले के कई विकल्प होने के बावजूद, यह मिशन बेहद जटिल, जोखिम भरा है।
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान पर हमलों को जारी रखने को लेकर अपनाए जा रहे उतार-चढ़ाव भरे रुख के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गहरी चिंता पैदा हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पश्चिम एशियाई देश ईरान पर ज़मीनी हमला (ग्राउंड इन्वेज़न) किया जाएगा, क्योंकि ऐसा कदम पहले से ही नाज़ुक हालात को पूरी तरह बेकाबू बना सकता है।
कुछ ही दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिका युद्ध पहले ही जीत चुका है। वहीं उनके विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा था कि अमेरिका बिना ज़मीनी सेना उतारे भी ईरान में अपने लक्ष्य हासिल कर सकता है। इसके बावजूद, द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि पेंटागन ईरान में कई हफ्तों तक चलने वाले सीमित ज़मीनी ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है। इसमें ख़ार्ग द्वीप (Kharg Island), जो ईरान के तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास के तटीय क्षेत्रों पर हमले शामिल हो सकते हैं।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार का एक अहम मार्ग है, जिसे ईरान ने हाल के इज़राइल-अमेरिका हमलों के बाद अवरुद्ध कर दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने के लिए अतिरिक्त सैनिक भेजे हैं और हाल ही में 3,500 और सैनिक इस क्षेत्र में पहुंचे हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने बताया कि ये सैनिक USS Tripoli युद्धपोत के नेतृत्व वाली इकाई से जुड़े हैं, जो हमले और परिवहन उपकरणों से लैस है।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कमांडर-इन-चीफ ट्रंप ने ज़मीनी हमले को मंजूरी दी है या नहीं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार चिंतित हैं। द गार्जियन के विदेशी मामलों के टिप्पणीकार साइमन टिस्डॉल ने लिखा कि इराक और अफगानिस्तान जैसे युद्धों की भयावहता के बाद भी एक अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा फिर से मध्य पूर्व में ज़मीनी सेना भेजने पर विचार करना हैरान करने वाला है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप को अपनी गलती माननी चाहिए, लेकिन उनके व्यक्तित्व को देखते हुए यह संभावना बेहद कम है।
ज़मीनी ऑपरेशन कैसे हो सकते हैं?
अगर अमेरिका ज़मीनी हमला करता है, तो यह पूर्ण युद्ध के बजाय सीमित और तेज़ “रेड-स्टाइल” मिशन हो सकता है। इसमें स्पेशल फोर्स, मरीन और एयरबोर्न सैनिक शामिल हो सकते हैं। इन अभियानों के मुख्य उद्देश्य हो सकते हैं—ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करना या कब्ज़ा करना, ख़ार्ग द्वीप जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण करना, और खुफिया जानकारी जुटाकर जल्दी वापस लौटना।
इन अभियानों में पैराट्रूपर्स (जैसे 82वीं एयरबोर्न डिवीजन) की तैनाती, हवाई हमलों का समर्थन, और विशेष बलों द्वारा लक्ष्यों पर सटीक कार्रवाई शामिल हो सकती है। इसके अलावा समुद्री रास्ते से मरीन सैनिक ईरान के तटीय इलाकों और तेल निर्यात केंद्रों को निशाना बना सकते हैं।
एक अन्य रणनीति अप्रत्यक्ष युद्ध की हो सकती है, जिसमें अमेरिका स्थानीय समूहों (जैसे कुर्द बलों) को समर्थन देकर ईरान के खिलाफ लड़ाई लड़वाए। अफगानिस्तान (2001) और इराक (2003) में अमेरिका ने इसी तरह की रणनीति अपनाई थी।
ईरान पर हमला करना कितना मुश्किल?
ईरान पर हमला करना आसान नहीं होगा। यह देश लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसका भूगोल बेहद चुनौतीपूर्ण है। यहाँ ज़ाग्रोस और अल्बोर्ज जैसी बड़ी पर्वत श्रृंखलाएँ हैं, जबकि मध्य क्षेत्र प्राकृतिक बाधा का काम करते हैं। इसके तटीय इलाके भी सैन्य रूप से मजबूत हैं।ईरान को एक “किले जैसे पठार” के रूप में समझा जा सकता है—सीमाओं से प्रवेश करना आसान हो सकता है, लेकिन अंदर तक घुसना बेहद कठिन।
संभावित हमले के रास्ते
1. उत्तर दिशा से
अज़रबैजान, आर्मेनिया और तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों के रास्ते से हमला करना मुश्किल है। इन देशों की राजनीतिक स्थिति और तटस्थता इस विकल्प को कमजोर बनाती है।
2. पश्चिम से (इराक के जरिए)
यह अपेक्षाकृत आसान रास्ता माना जाता है क्योंकि अमेरिका पहले भी इराक में अभियान चला चुका है। लेकिन ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखला यहां भी बड़ी बाधा बन सकती है।
3. पूर्व से (अफगानिस्तान के जरिए)
यह सबसे कम संभावित विकल्प है। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद वहां से ऑपरेशन चलाना मुश्किल होगा, और रेगिस्तानी इलाके भी बड़ी चुनौती हैं।
4. फारस की खाड़ी से
समुद्री रास्ते से हमला सबसे प्रभावी हो सकता है। अमेरिका अपने मरीन सैनिकों को तट पर उतारकर अंदर की ओर बढ़ सकता है। लेकिन इस रास्ते पर ईरान की सबसे मजबूत सैन्य तैयारी भी मौजूद है, जिससे भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है।
खाड़ी देशों की भूमिका
अमेरिका के पास खाड़ी देशों में कई सैन्य ठिकाने हैं, जो ज़मीनी हमले के लिए अहम हो सकते हैं। लेकिन हाल के हमलों के बाद ये देश अमेरिका को खुला समर्थन देने से हिचक रहे हैं, क्योंकि उन्हें ईरान की जवाबी कार्रवाई का डर है।सऊदी अरब जैसे बड़े देश भी इस संघर्ष को बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि वे पहले से ही यमन जैसे मोर्चों पर तनाव झेल रहे हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिका के लिए ईरान पर ज़मीनी हमला करना न केवल सैन्य दृष्टि से कठिन है, बल्कि इसके राजनीतिक और कूटनीतिक जोखिम भी बहुत बड़े हैं। अगर ऐसा कदम उठाया जाता है, तो यह पूरे क्षेत्र को एक बड़े और अनियंत्रित युद्ध की ओर धकेल सकता है।

