Venezuela: दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, लेकिन फिर भी बर्बाद ये मुल्क
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Venezuela: दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार, लेकिन फिर भी बर्बाद ये मुल्क

Venezuela crisis: देश की अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह तेल पर निर्भर है। जब तेल के दाम ऊंचे थे, तब समस्या नहीं दिखी। लेकिन कीमतें गिरते ही पूरी अर्थव्यवस्था चरमराने लगी।


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Venezuelan oil reserves: दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश में लोग भूख और गरीबी से जूझ रहे हैं। सोने जैसी जमीन, काला सोना यानी तेल और अरबों डॉलर की दौलत। लेकिन फिर भी जनता के हाथ खाली हैं। वेनेजुएला की कहानी सिर्फ आर्थिक तबाही नहीं, यह सत्ता, भू-राजनीति और गलत फैसलों की कहानी है, जिसमें अमेरिका की हरकतों ने आग में घी डाल दिया। यहां तेल के महासागर में डूबते देश की सच्चाई कुछ ऐसी है कि सुनकर आप सोचेंगे कि इतनी दौलत और इतनी गरीबी कैसे साथ रह सकते हैं?

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार लगभग 303 बिलियन बैरल है यानी कि वैश्विक तेल भंडार का करीब 20%। वेनेजुएला का ज्यादातर तेल भारी और गाढ़ा है और इसे रिफाइन करना महंगा और कठिन है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत गिरने पर देश को फायदा नहीं होता। कागज पर भंडार बड़ा लगता है। लेकिन असल में उसे पैसे में बदलना आसान नहीं है।

PDVSA और तेल उत्पादन की गिरावट

सरकारी तेल कंपनी PDVSA कभी देश की रीढ़ थी। लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और खराब प्रबंधन ने इसे कमजोर कर दिया। निवेश रुके, मशीनें पुरानी हो गईं और कुशल कर्मचारी देश छोड़कर चले गए। तेल उत्पादन तेजी से घटा और आज भी देश अपनी पहले की क्षमता तक नहीं पहुंच पाया।

तेल पर टिकी अर्थव्यवस्था

देश की अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह तेल पर निर्भर है। खेती, उद्योग और अन्य निर्यात क्षेत्र कमजोर पड़ गए। जब तेल के दाम ऊंचे थे, तब समस्या नहीं दिखी। लेकिन कीमतें गिरते ही पूरी अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। इसे आर्थिक विशेषज्ञ “संसाधन का श्राप” कहते हैं।

सब्सिडी और सरकारी कंट्रोल

सरकार ने पेट्रोल और जरूरी सामानों पर भारी सब्सिडी दी। शुरुआत में यह अच्छा लगा, गरीबी कम हुई और शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ा। लेकिन 2014 के बाद तेल की कीमतें गिरने लगीं। सब्सिडी जारी रखने के लिए सरकार ने नोट छापना शुरू किया, जिससे मुद्रा तेजी से गिरती गई। 2018 में महंगाई दर 10,00,000% तक पहुंच गई। लोग थैले भरकर नोट ले जाते थे, फिर भी सामान नहीं खरीद पाते थे।

अमेरिका के प्रतिबंधों का असर

2019 के बाद अमेरिका ने वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। तेल बेचने, पैसा प्राप्त करने, शिपिंग और इंश्योरेंस की प्रक्रिया मुश्किल हो गई। इसके सबसे ज्यादा असर सरकारी तेल कंपनी PDVSA पर पड़ा। तेल बेचने की कीमतें गिर गईं और देश की आर्थिक हालत और खराब हो गई। अमेरिका ने प्रतिबंध राजनीतिक कारणों से लगाए। उनका आरोप था कि मादुरो सरकार में चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए, विपक्ष दबाया गया और मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ। साथ ही वेनेजुएला की रूस, चीन और ईरान से बढ़ती नजदीकियों ने भी अमेरिका को नाराज किया।

अमेरिका का सैन्य हमला

3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की। राजधानी काराकस और कई इलाकों में हवाई हमले और धमाके हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “लार्ज-स्केल ऑपरेशन” बताया। अमेरिका का दावा है कि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर देश से बाहर ले जाया गया है। वेनेजुएला सरकार ने इसे खुला आक्रमण करार देते हुए राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर दिया।

मादुरो की गिरफ्तारी की वजह

अमेरिका पिछले साल से मादुरो सरकार को अवैध और अपराध से जुड़ा बताता रहा है। 2020 में ड्रग-टेररिज्म के आरोपों के साथ मादुरो की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया गया, जो बाद में 20 मिलियन डॉलर तक बढ़ गया। विश्लेषकों का मानना है कि टकराव के पीछे वेनेजुएला का विशाल तेल भंडार और अमेरिका की भू-राजनीतिक रणनीति शामिल है।

आगे का खतरा

सैन्य कार्रवाई से मादुरो की सत्ता कमजोर दिख रही है, लेकिन हालात और बिगड़ने का खतरा है। वेनेजुएला की सेना मजबूत है और सरकार के समर्थक सशस्त्र समूह हैं। अगर टकराव लंबा खिंचा तो पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है, शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है और देश की दिशा अनिश्चित हो जाएगी। ट्रंप प्रशासन सैन्य दबाव बनाए रखने की स्थिति में है। स्थिति नाजुक बनी हुई है और आगे क्या होगा, यह पूरी दुनिया की नजरों में है।

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