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ईरान में सड़कों पर हिंसा और आक्रोश; अमेरिका की नजरें, ये अदावत है 47 साल पुरानी

Iran crisis: ईरान के विरोध-प्रदर्शन केवल देश के अंदरूनी संकट का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह लंबे समय से चले आ रहे भू-राजनीतिक खेल और विदेशी हस्तक्षेप का भी असर हैं।


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Iran protests: 16 दिन पहले शुरू हुई छोटी-सी नाराजगी अब भयंकर विरोध प्रदर्शन में बदल चुकी है। महंगाई और बेरोजगारी से तंग आए ईरानी लोग सीधे अपने सर्वोच्च नेता खामेनेई के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। हजारों गिरफ्तार, सैकड़ों मौतें और देश के हर कोने से उठते बगावती तेवर के बीच ईरान अब संघर्ष का अखाड़ा बन चुका है। इस बीच अमेरिका अपनी पुरानी दुश्मनी और भू-राजनीतिक खेल के चलते अपने हथियारों और धमकियों के साथ तैयार बैठा हुआ है।

ईरान में 100 से अधिक शहरों की सड़कों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच लगातार टकराव हो रहा है। हालांकि, ईरान से सटीक खबरें बाहर आना मुश्किल है, लेकिन स्थानीय मीडिया और अंदरूनी सूत्रों के अनुसार अब तक 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हजारों प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ऐसा सबसे बड़ा सरकार-विरोधी आंदोलन है। ईरानी लोग खामेनेई और उनकी सरकार को हटाने की मांग कर रहे हैं।

आंदोलन पर सख्ती

ईरान के जनरल प्रॉसिक्यूटर मोहम्मद काजिम मोवाहेदी आजाद ने देश भर में अदालतों को निर्देश दिया है कि आंदोलन में शामिल सभी लोगों के खिलाफ मुकदमा तुरंत चलाया जाए। उन्होंने कहा कि आरोप गंभीर हैं: “खुदा के खिलाफ जंग छेड़ना”, जिसकी सजा मौत है। इस कदम से हालात और बिगड़ सकते हैं और हिंसा बढ़ने की आशंका है।

अमेरिका की धमकी

अमेरिका इस आपदा का फायदा उठाने में पीछे नहीं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने प्रदर्शनकारियों पर सख्ती की तो अमेरिका की प्रतिक्रिया बहुत गंभीर होगी। अमेरिकी मानवाधिकार संगठन भी ईरान की स्थिति पर चिंता जता चुके हैं और इसे असामान्य हालात बता रहे हैं। हालांकि, ईरानी नेता अमेरिका को साफ संदेश दे चुके हैं कि देश के अंदरूनी मामलों में दखल देने का कोई भी प्रयास खतरनाक परिणाम देगा।

ईरान का ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक महत्व

ईरान का भूगोल और प्राकृतिक संसाधन इसे दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। यह देश फारस और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले स्ट्रेट ऑफ हार्मुज पर स्थित है, जिसके रास्ते दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। इतिहास में देखा जाए तो अमेरिका हमेशा ईरान के संसाधनों और भू-राजनीतिक स्थिति पर नियंत्रण रखना चाहता रहा है। 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसादिक का तख्तापलट किया और शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता सौंपी। शाह का राजशाही शासन, भव्य जीवनशैली और अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध आम ईरानी जनता को पसंद नहीं आया। धीरे-धीरे विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, जिसकी अगुवाई आयातुल्लाह खुमैनी कर रहे थे।

1979 की इस्लामिक क्रांति और खुमैनी की वापसी

14 साल निर्वासन में रहने के बाद खुमैनी 1 फरवरी 1979 को ईरान लौटे। तेहरान में लाखों लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। इस क्रांति ने शाह की सत्ता का अंत कर दिया और ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना हुई। नई सरकार ने अमेरिका के खिलाफ रुख अपनाया और इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी लगातार बढ़ती रही। इस दुश्मनी के कारण ईरान पर पिछले 47 सालों में कई आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध लगाए गए।

अमेरिका और ईरान: वर्तमान तनाव

2015 में बराक ओबामा और हसन रोहानी के बीच परमाणु समझौता हुआ, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने इसे छोड़ दिया। इसके बाद अमेरिका लगातार ईरान पर दबाव डाल रहा है। सऊदी अरब और इजराइल जैसे देश भी ईरान को कमजोर करना चाहते हैं। अभी ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच सवाल उठता है कि क्या अमेरिका इस बार सीधे हमला करेगा। हालांकि अब तक ईरान ने अमेरिका के सामने झुकने से इनकार किया है और अमेरिका भी सीधे हमला करने में हिचकिचा रहा है।

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