पर्यावरण पर युद्ध की मार, सिर्फ 14 दिनों में निकला 84 देशों से ज्यादा कार्बन
x

पर्यावरण पर युद्ध की मार, सिर्फ 14 दिनों में निकला 84 देशों से ज्यादा कार्बन

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध ने अपने पहले 14 दिनों में 50 लाख टन से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है। । यह उत्सर्जन बुनियादी ढांचे के विनाश, भारी ईंधन खपत और तेल डिपो में लगी आग के कारण हुआ है।


युद्ध केवल इंसानी जानों और अर्थव्यवस्था का ही नुकसान नहीं करता, बल्कि यह हमारे ग्रह (Earth) पर ऐसे गहरे जख्म छोड़ जाता है जिन्हें भरने में दशकों लग सकते हैं। हाल ही में 'क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट' द्वारा किए गए एक चौंकाने वाले विश्लेषण से पता चला है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है।

सिर्फ 14 दिनों में भारी उत्सर्जन

इस अध्ययन के अनुसार, युद्ध के पहले 14 दिनों में ही लगभग 50 लाख टन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि दुनिया के 84 सबसे कम उत्सर्जन करने वाले देशों के पूरे साल के कुल कार्बन उत्सर्जन से भी ज्यादा है। यह स्टडी घाना के 'यूनिवर्सिटी ऑफ एनर्जी एंड नेचुरल रिसोर्सेज' के फ्रेड ओटू-लार्बी के नेतृत्व में की गई है।

1. मलबे में तब्दील इमारतें: कार्बन का सबसे बड़ा स्रोत

युद्ध में नागरिक बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का विनाश उत्सर्जन का सबसे बड़ा कारण बना है। ईरानी रेड क्रिसेंट की रिपोर्ट है कि अमेरिका-इजरायल के हमलों में लगभग 20,000 इमारतें क्षतिग्रस्त हुई हैं। इन इमारतों के गिरने और फिर से बनने की प्रक्रिया में करीब 24 लाख टन CO2 के बराबर उत्सर्जन होने का अनुमान है। शोधकर्ताओं ने ईरान के बड़े हिस्सों को 'पर्यावरण बलि क्षेत्र' (Environmental Sacrifice Zone) करार दिया है।

2. फाइटर जेट्स और नौसैनिक बेड़े: ईंधन की भारी खपत

सैन्य अभियान उत्सर्जन का दूसरा सबसे बड़ा कारण हैं। पहले दो हफ्तों में विमानों, जहाजों और जमीनी वाहनों द्वारा 15 करोड़ से 27 करोड़ लीटर ईंधन जलाया गया। अकेले इससे 5.29 लाख टन कार्बन उत्सर्जन हुआ। इसमें इंग्लैंड से उड़ान भरने वाले अमेरिकी भारी बमवर्षक (Heavy Bombers) सबसे बड़े योगदानकर्ता रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र में तैनात अमेरिकी नौसेना के बेड़े 'तैरते शहरों' की तरह हैं, जिन्हें चौबीसों घंटे ऊर्जा, भोजन और आवास की जरूरत होती है, जिससे प्रदूषण और बढ़ता है।

3. तेल की आग और जहरीली बारिश

तेहरान के आसमान में काले बादलों और काली बारिश की तस्वीरों ने दुनिया को डरा दिया है। इजरायल द्वारा ईरान के प्रमुख तेल डिपो पर किए गए हमलों और जवाबी कार्रवाई में 25 लाख से 59 लाख बैरल तेल नष्ट हो गया है। इससे करीब 1.88 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड निकली है। इसके अलावा, नष्ट हुए सैन्य उपकरणों (जैसे विमान, जहाज और मिसाइल लॉन्चर) ने भी पर्यावरण में भारी मात्रा में जहर घोला है।

4. कुवैत के सालाना उत्सर्जन के बराबर नुकसान

इस युद्ध के शुरुआती दो हफ्तों का कुल कार्बन उत्सर्जन 50,55,016 टन रहा, जो कुवैत जैसे देश के पूरे साल के उत्सर्जन के बराबर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे-जैसे तेल सुविधाओं को निशाना बनाया जा रहा है, यह उत्सर्जन और भी तेजी से बढ़ेगा।

इंस्टीट्यूट के रिसर्च डायरेक्टर पैट्रिक बिगर ने चेतावनी दी है कि हर मिसाइल हमला एक गर्म और अस्थिर ग्रह की ओर बढ़ाया गया कदम है। वर्तमान दर से, मानवता के पास तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए बहुत कम समय बचा है। यह युद्ध केवल देशों को नहीं, बल्कि पूरी मानवता के भविष्य को खतरे में डाल रहा है।

Read More
Next Story