
सैन्य जमावड़ा बनाम कूटनीति, किस दिशा में बढ़ रहा संकट?
अमेरिका-ईरान तनाव में सैन्य जमावड़ा बढ़ा, कूटनीति कमजोर पड़ी; विशेषज्ञों के अनुसार पूर्ण युद्ध कम, लेकिन सीमित हमलों और टकराव का खतरा बरकरार है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव क्या एक व्यापक युद्ध की ओर बढ़ रहा है, या फिर अब भी किसी समझौते की संभावना बाकी है? इस सवाल को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और राजनयिक रफ्ताब कमाल पाशा तथा परामर्श संपादक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ के.एस. दक्षिणा मूर्ति से बातचीत की गई।
सैन्य जमावड़ा
संयुक्त राज्य अमेरिका ने पश्चिम एशिया में हजारों अतिरिक्त मरीन और पैराट्रूपर्स तैनात किए हैं, जिससे पहले से मौजूद उसकी बड़ी सैन्य उपस्थिति और मजबूत हो गई है। रिपोर्टों के अनुसार, यह लगभग 20 वर्षों में सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है। इस तैनाती में यूएसएस ट्रिपोली उभयचर आक्रमण पोत भी शामिल है, जिसमें लगभग 3,500 सैनिकों के साथ विमान और सामरिक संसाधन मौजूद हैं। इस कदम से संभावित जमीनी हमले की अटकलें तेज हो गई हैं।
दूसरी ओर, ईरान ने भी कड़े तेवर दिखाए हैं। तेहरान टाइम्स की एक चेतावनी में कहा गया कि यदि अमेरिकी सैनिक ईरानी जमीन पर प्रवेश करते हैं, तो वे “ताबूत में ही वापस लौटेंगे”, जो इस संघर्ष की गंभीरता को दर्शाता है।
युद्ध या दबाव की रणनीति?
हालांकि दोनों पक्षों की आक्रामक मुद्रा के बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सैन्य गतिविधियां पूर्ण युद्ध की तैयारी के बजाय दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं। दक्षिणा मूर्ति के अनुसार, अमेरिका “बहु-आयामी रणनीति” अपना रहा है—जिसमें सैन्य दबाव, कूटनीतिक संकेत और मनोवैज्ञानिक दबाव शामिल हैं। उनका कहना है कि एक ओर सैनिकों की तैनाती के जरिए तनाव बढ़ाया जा रहा है, तो दूसरी ओर समझौते की संभावनाओं की बातें भी की जा रही हैं, ताकि ईरान पर अधिकतम दबाव बनाया जा सके।
सीमित हमलों की संभावना
रफ्ताब कमाल पाशा का मानना है कि पूर्ण पैमाने पर आक्रमण की संभावना कम है, लेकिन सीमित सैन्य कार्रवाई से इनकार नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, अमेरिका रणनीतिक लक्ष्यों—जैसे परमाणु प्रतिष्ठानों या नेतृत्व से जुड़े ठिकानों—पर लक्षित हमले कर सकता है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी किसी भी कार्रवाई को भारी प्रतिरोध और जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
जमीनी हकीकत
पाशा के अनुसार, ईरान रक्षात्मक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है, खासकर होरमुज जलडमरूमध्य और खार्ग द्वीप जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में। इन क्षेत्रों को खदानों, तोपखाने, मिसाइलों और भूमिगत सैन्य ढांचे से मजबूत किया गया है। उनका कहना है कि भले ही कोई क्षेत्रीय कब्जा दिखाया जाए, लेकिन उस पर नियंत्रण बनाए रखना बेहद कठिन होगा।
क्षेत्रीय खतरे
इस संघर्ष के बढ़ने से पूरे खाड़ी क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। पाशा ने चेतावनी दी कि ईरान पड़ोसी देशों की महत्वपूर्ण संरचनाओं—जैसे बिजली संयंत्र और जल शोधन सुविधाओं—को निशाना बना सकता है। साथ ही, होरमुज जलडमरूमध्य में व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है, जहां 100 से अधिक जहाज, जिनमें भारतीय जहाज भी शामिल हैं, प्रभावित हो सकते हैं।
वार्ता में गतिरोध
कूटनीतिक प्रयास फिलहाल कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। कई देशों की भागीदारी वाली वार्ताएं, जिनमें इस्लामाबाद में हुई बातचीत भी शामिल है, कोई ठोस परिणाम नहीं दे सकीं। दक्षिणा मूर्ति ने इसे “प्रक्रिया में जारी” बताया, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच गहरे अविश्वास को बड़ी बाधा माना। ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव के कई हिस्सों को अव्यावहारिक और अत्यधिक बताते हुए खारिज कर दिया है।
अव्यावहारिक मांगें
चर्चा में यह भी सामने आया कि अमेरिका की मांगों में ईरान का परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता और समृद्ध यूरेनियम भंडार पूरी तरह खत्म करना शामिल है। दक्षिणा मूर्ति के अनुसार, यह किसी देश से “पूरी तरह आत्मसमर्पण” की अपेक्षा करने जैसा है, जिसे कोई भी राष्ट्र स्वीकार नहीं करेगा।
ट्रंप की रणनीति
दोनों विशेषज्ञों ने इस संकट में डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चित रणनीति को भी अहम बताया। पाशा के अनुसार, ट्रंप कभी आक्रामक बयान देते हैं तो कभी शांति की बात करते हैं। दक्षिणा मूर्ति का मानना है कि ट्रंप एक साथ कई विकल्प तैयार कर रहे हैं—तनाव बढ़ाना, दबाव बनाना और अंततः किसी समाधान के साथ बाहर निकलने का रास्ता।
वैश्विक शक्तियों की भूमिका
इस स्थिति में रूस और चीन जैसे देश भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पाशा के अनुसार, खासकर रूस मध्यस्थता कर युद्धविराम की दिशा में पहल कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान बातचीत के लिए पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन वह अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करना चाहता।
अनिश्चित भविष्य
लगातार कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण युद्ध की संभावना भले कम हो, लेकिन सीमित हमलों या गलत आकलन के कारण तनाव बढ़ने का खतरा बना हुआ है। सैन्य जमावड़ा, ठप वार्ता और आक्रामक बयानबाजी ने माहौल को अस्थिर बना दिया है, जिसका वैश्विक असर पड़ सकता है।
जैसे-जैसे यह संघर्ष अपने 31वें दिन में प्रवेश कर रहा है, पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं—यह देखना बाकी है कि हालात शांत होंगे या टकराव और बढ़ेगा।

