कौन थे अली लारिजानी? जानिए क्यों माने जाते थे ईरान के चाणक्य
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कौन थे अली लारिजानी? जानिए क्यों माने जाते थे ईरान के 'चाणक्य'

ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव और पूर्व संसद अध्यक्ष अली लारीजानी इजरायली हमले में मारे गए हैं। सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत के बाद लारीजानी ईरान की कमान संभालने वाले सबसे प्रमुख चेहरों में से एक थे।


Iran Isreal War : ईरान-इजरायल युद्ध के बीच एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। ईरान के सबसे ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं में से एक, अली लारीजानी अब नहीं रहे। ईरानी सरकारी मीडिया और इजरायली रक्षा मंत्री योव गैलेंट (Israel Katz) ने पुष्टि की है कि लारीजानी एक हवाई हमले में मारे गए हैं। यह हमला उस समय हुआ जब ईरान पहले से ही अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा था।

कौन थे अली लारीजानी?

अली लारिजानी का जन्म 3 जून 1958 को इराक के नजफ शहर में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से ईरान के अमोल शहर का एक अमीर और प्रभावशाली परिवार था। उनका परिवार इतना ताकतवर था कि 2009 में टाइम मैगज़ीन ने उन्हें “ईरान के केनेडी” कहा था। उनके पिता मिर्जा हाशेम आमोली एक बड़े धार्मिक विद्वान थे। उनके भाई भी ईरान के बहुत बड़े पदों पर रहे हैं, जैसे न्यायपालिका और “असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स” (एक परिषद जो देश के सर्वोच्च नेता को चुनती और उसकी निगरानी करती है)।

लारिजानी के रिश्ते ईरान की 1979 की क्रांति के नेताओं से भी जुड़े थे। उन्होंने 20 साल की उम्र में फरीदेह मोटाहरी से शादी की, जो मोर्तेज़ा मोटाहरी की बेटी थीं। मोर्तेज़ा मोटाहरी, ईरान के संस्थापक रुहोल्लाह खोमैनी के करीबी थे।उनके परिवार का धार्मिक बैकग्राउंड होने के बावजूद उनके बच्चों की सोच अलग-अलग रही। उनकी बेटी फातिमा ने तेहरान यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई अमेरिका के ओहायो में की।

“गणितज्ञ और दार्शनिक”

लारिजानी सिर्फ धार्मिक शिक्षा से नहीं आए थे, बल्कि उनकी पढ़ाई आधुनिक विषयों में भी थी। 1979 में उन्होंने शरीफ यूनिवर्सिटी से गणित और कंप्यूटर साइंस में डिग्री ली। बाद में तेहरान यूनिवर्सिटी से पश्चिमी दर्शन में मास्टर्स और पीएचडी की, जिसमें उन्होंने इमैनुएल कांट पर रिसर्च की।

राजनीति में रहा महत्वपूर्ण करियर

1979 की क्रांति के बाद वे 1980 के दशक में आईआरजीसी (ईरान की सैन्य ताकत) में शामिल हुए। बाद में वे सरकार में आए और 1994 से 1997 तक संस्कृति मंत्री रहे। फिर 1994 से 2004 तक वे ईरान के सरकारी टीवी (IRIB) के प्रमुख रहे। इस दौरान उन पर आरोप लगा कि उनकी सख्त नीतियों के कारण युवा विदेशी मीडिया की ओर जाने लगे। 2008 से 2020 तक वे लगातार तीन बार संसद (मजलिस) के स्पीकर रहे और देश की नीतियों पर बड़ा प्रभाव डाला।

“सुरक्षा क्षेत्र में वापसी”

लारिजानी ने 2005 में राष्ट्रपति बनने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। उसी साल उन्हें सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का सचिव और परमाणु वार्ताकार बनाया गया। 2007 में उन्होंने यह पद छोड़ दिया क्योंकि उनकी नीतियां तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद से अलग थीं। 2008 में वे संसद में चुने गए और स्पीकर बने। उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) को मंजूरी दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 2021 और 2024 के चुनावों में उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए खड़े होने से रोक दिया गया। कारण नहीं बताया गया, लेकिन माना गया कि 2021 में यह कदम इब्राहिम रईसी के लिए रास्ता साफ करने के लिए था। अगस्त 2025 में उन्हें फिर से राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का सचिव बनाया गया। इसके बाद उनका रुख और सख्त हो गया। अक्टूबर 2025 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) के साथ सहयोग खत्म कर दिया।

युद्ध के बीच कूटनीति

हालांकि वे सख्त थे, लेकिन उन्हें एक समझदार और समझौता करने वाले नेता के रूप में भी देखा जाता था। 2015 के परमाणु समझौते में उनका बड़ा योगदान था। हाल के तनाव से पहले वे अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि बातचीत ही सही रास्ता है। लेकिन अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद हालात बदल गए। उन्होंने कहा कि ईरान किसी क्षेत्रीय देश पर हमला नहीं करेगा, लेकिन अमेरिका के ठिकानों को निशाना बनाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अमेरिका से कोई बातचीत नहीं करेगा। 5 मार्च को उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी सेना ईरान में आई, तो उन्हें मार दिया जाएगा या पकड़ लिया जाएगा। 13 मार्च को, भारी बमबारी के बावजूद, वे तेहरान की सड़कों पर लोगों के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए।

ईरान के लिए यह कितनी बड़ी क्षति है?

अली लारीजानी की मौत ईरान के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। वह सुरक्षा तंत्र, सेना और राजनीति के बीच एक 'पुल' की तरह काम करते थे। खामेनेई की मौत के बाद जो 'ट्रांजिशनल काउंसिल' ईरान को चला रही थी, उसमें लारीजानी की भूमिका सबसे अहम थी। इजरायल ने लारीजानी के साथ-साथ ईरान के बासिज अर्धसैनिक बल के प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल गुलामरेजा सुलेमानी को भी निशाना बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े स्तर के नेताओं का एक के बाद एक मारा जाना ईरान की निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।

क्या होगा लारीजानी की मौत का असर?

लारीजानी ने अपनी मौत से पहले स्पष्ट किया था कि ईरान अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिका के 10 मिलियन डॉलर के इनाम और धमकियों को ठेंगा दिखाते हुए कहा था कि नेताओं को मारने से ईरान अस्थिर नहीं होगा। हालांकि, सच यह है कि लारीजानी जैसा कूटनीतिज्ञ और रणनीतिकार ढूंढना ईरान के लिए अब एक बड़ी चुनौती होगी।

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