कौन थे अयातुल्लाह अली खामेनेई? क्यों करते रहे अमेरिका और इजरायल से नफरत?
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कौन थे अयातुल्लाह अली खामेनेई? क्यों करते रहे अमेरिका और इजरायल से नफरत?

अयातोल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु ईरान के 47 साल पुराने इस्लामी शासन के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। खामेनेई ने दशकों तक ईरानी नागरिकों के जीवन को नियंत्रित किया।


Who Was Ayatollah Ali Khamenei: इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों में ईरान के सर्वोच्चे नेता अयातोल्लाह अली खामनेई की मौत हो गई। खामनेई ने 47 सालों तक ईरान पर शासन किया। लेकिन अब अयातोल्लाह अली खामेनेई की मौत के साथ एक ऐसे युग का अंत हो गया है जिसने लगभग चार दशकों तक न केवल ईरान, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीति को अपनी कठोर विचारधारा से बांधे रखा था। कौन थे अयातोल्लाह अली खामेनेई और आखिर क्यों वो अमेरिका और इजरायल से नफरत करते थे। चलिए समझते हैं।

विरासत और विचारधारा का बोझ

खामेनेई ने ईरान के इस्लामी गणराज्य का निर्माण नहीं किया था, बल्कि उन्हें यह विरासत में मिला था। 1979 की क्रांति के बाद अयातोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने एक राजशाही को हटाकर जिस तंत्र की स्थापना की, उसके तीन मुख्य स्तंभ थे: "अमेरिका की मौत," "इजरायल की मौत," और महिलाओं के लिए अनिवार्य हिजाब। खुमैनी के लिए हिजाब केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि 'क्रांति का झंडा' था। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई का पूरा जीवन इसी पुरानी क्रांति को कृत्रिम रूप से जीवित रखने में बीत गया, जबकि ईरानी समाज काफी आगे निकल चुका था।

सत्ता का खेल और पैंतरेबाजी

खामेनेई का सर्वोच्च नेता बनना कोई नियति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चाल थी। 1989 में हाशमी रफसंजानी ने यह दावा करके खामेनेई को गद्दी पर बिठाया कि यह खुमैनी की अंतिम इच्छा थी। रफसंजानी को लगा था कि खामेनेई एक कमजोर मोहरा साबित होंगे जिन्हें आसानी से नियंत्रित किया जा सकेगा, लेकिन खामेनेई ने जल्द ही पासा पलट दिया।

खामेनेई और रफसंजानी के बीच दशकों तक प्रतिद्वंद्विता चली। जहाँ रफसंजानी अमेरिका के साथ संबंध सुधारने और आर्थिक विकास के पक्षधर थे, वहीं खामेनेई का मानना था कि क्रांतिकारी सिद्धांतों से समझौता करना शासन के पतन को न्योता देना होगा। अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के लिए खामेनेई ने 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) को अपनी निजी सेना के रूप में पाला-पोसा। नतीजा यह हुआ कि पादरी वर्ग (Clergy) से ज्यादा ताकतवर यह सैन्य संगठन बन गया, जिसने ईरान की अर्थव्यवस्था पर भी कब्जा कर लिया।

शत्रुता पर टिकी सत्ता

खामेनेई के लिए अमेरिका केवल एक देश नहीं, बल्कि एक 'शैतान' था। एरिक हॉफर ने अपनी किताब 'द ट्रू बिलीवर' में लिखा है कि जन आंदोलनों को एकजुट रखने के लिए भगवान में विश्वास से ज्यादा जरूरी एक दुश्मन (Devil) में विश्वास होता है। खामेनेई ने इसी नफरत का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए किया। उन्होंने एक बार कहा था, "ईरान और अमेरिका के बीच सुलह संभव है, लेकिन 'इस्लामिक रिपब्लिक' और अमेरिका के बीच नहीं।" इसका अर्थ साफ था—अगर अमेरिका से दुश्मनी खत्म हुई, तो उनके शासन का आधार ही खत्म हो जाएगा।

जनता बनाम शासन

खामेनेई ने राज्य और नागरिकों के बीच के रिश्ते को एक सामाजिक अनुबंध के बजाय एक 'शिकारी पट्टे' (Predatory Lease) की तरह माना। 9 करोड़ लोगों के निजी जीवन को नियंत्रित किया गया—वे क्या पिएंगे, क्या पहनेंगे और किसे प्यार करेंगे, यह सब शासन तय करने लगा। जहाँ जनता से सादगी की उम्मीद की गई, वहीं रिवोल्यूशनरी गार्ड्स टैक्स-फ्री व्यापारिक साम्राज्य चला रहे थे। जब भी जनता ने विरोध किया, उन्हें "ईश्वर के विरुद्ध युद्ध" छेड़ने का दोषी बताकर फांसी पर लटका दिया गया। हाल के महीनों में हुए प्रदर्शनों को दबाने के लिए खामेनेई ने जिस हिंसा का सहारा लिया, वह आधुनिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है।

क्रांति का अंत

खामेनेई एक ऐसे युग की रक्षा कर रहे थे जो अब अस्तित्व में नहीं है। उनका मानना था कि झुकने का मतलब टूटना है। लेकिन अंततः, जिस "अमेरिका और इजरायल की मौत" का नारा उन्होंने उम्र भर लगाया, उसी अमेरिका और इजरायल के हाथों उनका अंत हुआ। ट्रंप और नेतन्याहू, जिन्हें वे सबसे ज्यादा नफरत करते थे, उनके पतन का कारण बने। यह 47 साल पुरानी उस क्रांति के लिए एक निर्णायक मोड़ है, जिसने अपनी ही जनता को बंधक बना रखा था।

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