‘मेक इन इंडिया’ की हकीकत, 11 साल बाद भी अधूरा सपना

11 साल बाद भी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्वदेशी’ से उद्योग को वांछित गति नहीं मिली। GDP ऊँची दिखी, पर निजी निवेश और रोज़गार अब भी कमजोर हैं।;

Update: 2025-08-29 01:18 GMT

Make In India:  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्वदेशी’ (आत्मनिर्भर भारत, स्पेंड इन इंडिया) की अपील अक्सर सुर्खियों में रहती है। हाल ही में अमेरिका द्वारा भारत पर 50% टैरिफ लगाने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई। लेकिन हकीकत यह है कि बीते 11 सालों से इन अभियानों के बावजूद वांछित नतीजे सामने नहीं आए।

उद्योग क्षेत्र का धीमा प्रदर्शन

आधिकारिक आँकड़े तीन बड़ी बातें बताते हैं। वित्त वर्ष 2013–2025 के बीच उद्योग क्षेत्र (खनन, विनिर्माण, बिजली, गैस, पानी व अन्य उपयोगिताएं) की वास्तविक वृद्धि दर औसतन 5.5% रही।विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 5.95% रही, जबकि कुल GVA की दर 6% थी।‘मेक इन इंडिया’ (FY15) की शुरुआत पर उद्योग GVA की वृद्धि 7.2% थी, जो FY25 में घटकर 4.5% रह गई।विनिर्माण GVA 7.9% से घटकर 4.5% हो गया।उद्योग का GVA हिस्सा 22.5% (FY15) से घटकर 21.5% (FY25) हो गया।यह तस्वीर साफ दिखाती है कि उद्योग क्षेत्र ने समग्र आर्थिक वृद्धि को धीमा करने का काम किया।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की गिरावट

पुराने IIP सीरीज़ (2004–05) में औसत वृद्धि 8.8% थी, लेकिन नई सीरीज़ (2011–12) में यह घटकर 3.4% रह गई।विनिर्माण IIP 10% से घटकर 3.3% रह गया।बिजली IIP 5.9% रहा, जो विनिर्माण और कुल उद्योग से अधिक है। इसका संकेत है कि घरेलू बिजली खपत विनिर्माण से तेज़ बढ़ी।

इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर भी पिछड़ा

बिजली और उर्वरक को छोड़कर सभी कोर सेक्टर (इंफ्रास्ट्रक्चर) की औसत वृद्धि 5.2% से घटकर 4% रह गई।FY26 की पहली तिमाही में कोर सेक्टर की वृद्धि सिर्फ 1.3% रही।पाँच क्षेत्रों (बिजली, कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरक) में नकारात्मक वृद्धि दर्ज हुई।

केंद्र का रिकॉर्ड पूंजीगत निवेश (Capex Push)

FY17 में GDP के 2.9% से FY25 में 4.1% और FY26 (BE) में 4.3% तक केंद्र का पूंजीगत खर्च पहुँचा।महामारी के बाद सरकार ने बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च किया ताकि निजी निवेश (Private Capex) आकर्षित हो। इसके बावजूद उद्योग की वृद्धि सुस्त ही रही।

सुधार, योजनाएँ और फिर भी नाकामी

2014 से अब तक सरकार ने—

मेक इन इंडिया मिशन लॉन्च किया

FDI नियम उदार किए

कॉरपोरेट टैक्स घटाया

PLI और DLI योजनाएँ (14 सेक्टर, सेमीकंडक्टर आदि) शुरू कीं

PM-RPY, ABRY, ELI, PMIS जैसी योजनाओं से रोज़गार बढ़ाने की कोशिश कीलेकिन नतीजा वही—औद्योगिक उत्पादन घटता गया।

समस्या कहाँ है?

आँकड़ों की गड़बड़ी की संभावना कम है।वास्तविक समस्या शायद मांग (Demand) की कमजोरी है।निजी निवेश (Private Capex) FY08 में GDP का 16.8% था, जो FY13–FY24 में औसतन 10.9% और FY24 में 10.1% तक गिर गया।SBI चेयरमैन सी. एस. सेट्टी ने भी कहा था कि भारत की कंपनियां 13.5 लाख करोड़ रुपये कैश बैलेंस पर बैठी हैं, उन्हें बैंक क्रेडिट की ज़रूरत नहीं।

स्वदेशी की पुकार या महज़ नारेबाज़ी?

PLI का आवंटन FY22–FY25 तक सिर्फ 10.9% (₹21,534 करोड़) हुआ, जबकि कुल ₹1.97 लाख करोड़ तय थे।जिन क्षेत्रों में बड़े निवेश की ज़रूरत है, जैसे ACC बैटरियां, हाई-एफिशिएंसी सोलर मॉड्यूल, ड्रोन—वहाँ आवेदन बेहद कम हैं।जबकि कम लागत वाले क्षेत्रों फूड प्रोसेसिंग, स्पेशियलिटी स्टील, ऑटोमोबाइल में आवेदन ज़्यादा हैं। साफ है कि महज़ ‘स्वदेशी’ का नारा उद्योग को गति नहीं दे पा रहा।

बीते 11 सालों के आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्वदेशी’ योजनाओं ने वांछित परिणाम नहीं दिए। GDP भले ऊंची दिख रही हो, लेकिन औद्योगिक उत्पादन और निजी निवेश कमजोर है। असली चुनौती है गुणवत्तापूर्ण रोज़गार और बेहतर मजदूरी के अवसर पैदा करना, जो अभी भी अधूरा सपना बना हुआ है।

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