CPI(M) की 24वीं पार्टी कांग्रेस: राष्ट्रीय मीडिया की अनुपस्थिति और भविष्य की चुनौतियां
CPI(M) को अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत है ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति को फिर से मजबूत कर सके।;
सीपीआई(एम) की 24वीं पार्टी कांग्रेस के दूसरे दिन मदुरै में आयोजित प्रेस मीट के दौरान जब पोलित ब्यूरो की सदस्य बृंदा करात प्रेस के सामने आईं, तो मीडिया हॉल का माहौल कुछ खास था। लगभग 30 पत्रकार और कैमरा पर्सन इस इवेंट में मौजूद थे। लेकिन इनमें से अधिकतर पत्रकार मलयालम समाचार पत्रों और चैनलों से थे। बाकी पत्रकारों में कुछ एजेंसी रिपोर्टर्स और तमिल चैनलों के पत्रकार थे। लेकिन नेशलन मीडिया की पूरी अनुपस्थिति ध्यान आकर्षित करने वाली थी।
केरल आधारित पत्रकारों का दबदबा
प्रेस मीट में पूछे गए सवालों में से अधिकांश प्रश्न केरलीय पत्रकारों ने ही किए थे, जिनमें केवल एक सवाल पीटीआई के पत्रकार का और एक अन्य जनजातीय मुद्दों पर एक स्थानीय पत्रकार का था। यह दृश्य सीपीआई(एम) की घटती राष्ट्रीय उपस्थिति का संकेत दे रहा था, खासकर तब जब पार्टी का प्रभाव पहले के मुकाबले कहीं कम हो चुका है।
राष्ट्रीय प्रासंगिकता
पहले, 2000 के दशक की शुरुआत में, जब सीपीआई(एम) का राष्ट्रीय मंच पर एक मजबूत प्रभाव था, पार्टी की कांग्रेसों में मीडिया की भारी मौजूदगी होती थी। 2002 में हैदराबाद और 2005 में दिल्ली में आयोजित कांग्रेसों के दौरान, जहां पार्टी के वरिष्ठ नेता जैसे हरकिशन सिंह सूरजीत, प्रकाश करात और सीताराम येचुरी से संवाद करने के लिए मीडिया के लोग जुटते थे। वहीं, मीडिया का रुझान अब बदल चुका है। तब राष्ट्रीय मीडिया कांग्रेस को प्रमुखता से कवर करता था, जबकि अब उसकी उपस्थिति न के बराबर है।
आज की स्थिति में, जब राष्ट्रीय मीडिया सीपीआई(एम) की पार्टी कांग्रेस से गायब है, यह पार्टी की घटती प्रासंगिकता और उनके राष्ट्रीय प्रभाव की कमी को साफ तौर पर दिखाता है। एक पार्टी डेलीगेट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी राजनीतिक स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। मीडिया भी अब उतना ध्यान नहीं दे रहा है। हम इस स्थिति को लेकर जागरूक हैं और चर्चा कर रहे हैं। लेकिन हमें उम्मीद है कि पार्टी नई रणनीतियों और उपायों के साथ इस चुनौती का सामना करेगी।
केरल में सीपीआई(एम) की मजबूती
फिलहाल, सीपीआई(एम) केवल केरल में सत्ता में है, जबकि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे अन्य राज्य जहां पार्टी का पहले मजबूत असर था, अब वहां पार्टी की स्थिति बहुत कमजोर हो चुकी है। यह बदलाव न सिर्फ चुनावी आंकड़ों से दिखाई दे रहा है, बल्कि पार्टी कांग्रेस में भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है, जहां नेताओं और कार्यकर्ताओं के विचारों में बदलाव आ रहा है।
गठबंधन रणनीति पर पुनर्विचार
राजनीतिक समीक्षा रिपोर्ट में पार्टी को अपने गठबंधन रणनीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, जबकि भारतीय राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (INDIA) ने भाजपा को कुछ हद तक कमजोर किया है। लेकिन सीपीआई(एम) को इसका कोई खास लाभ नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में पार्टी को इसका कोई फायदा नहीं मिला और सीट-शेयरिंग समझौतों के कारण पार्टी को कई सीटों पर चुनावी मैदान में उतरने का मौका नहीं मिला।
प्रकाश करात का संदेश
पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रकाश करात ने अपनी उद्घाटन स्पीच में गठबंधन रणनीति की समीक्षा की आवश्यकता की बात की। उन्होंने कहा, "पार्टी कांग्रेस का मुख्य मुद्दा सीपीआई(एम) की स्वतंत्र ताकत को बढ़ाने का होगा। हमें जन मुद्दों और वर्ग संघर्षों पर ध्यान केंद्रित कर पार्टी को स्तर पर मजबूत करना होगा।
कांग्रेस के प्रति सीपीआई(एम) का रुख
बृंदा करात ने कांग्रेस के बारे में कहा कि कांग्रेस भारत की सबसे बड़ी धर्मनिरपेक्ष पार्टी है और भाजपा के खिलाफ भूमिका निभा सकती है। लेकिन उन्होंने कांग्रेस की खामियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सीपीआई(एम) कांग्रेस के साथ सहयोग तो करेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पार्टी कांग्रेस या अन्य पार्टियों को आलोचना करने से पीछे हटेगी। उन्होंने कहा, "हम कांग्रेस का आलोचनात्मक आकलन करते हैं। कांग्रेस एक शासक वर्ग की पार्टी है, जिसका समर्थन अब भाजपा की ओर स्थानांतरित हो चुका है। हालांकि, कांग्रेस भाजपा के खिलाफ भूमिका निभाती है, हम इसे आलोचना करने से पीछे नहीं हटेंगे।"
भाजपा और हिंदुत्व पर सीपीआई(एम) का रुख
सीपीआई(एम) भाजपा की बढ़ती ताकत को चुनौती देने के लिए एक ठोस विचारधारा तैयार करने पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि भाजपा की ताकत हिंदुत्व और कॉर्पोरेट ताकतों के गठबंधन से बढ़ रही है। बृंदा करात ने इस पर जोर दिया, "हिंदुत्व पूरी तरह से प्रॉ-कॉर्पोरेट है और हमें इसे चुनौती देनी होगी। भाजपा के खिलाफ केवल सांप्रदायिक आधार पर विरोध अब पर्याप्त नहीं रहेगा, हमें इसके कॉर्पोरेट नफे-नुकसान को भी समझना होगा।"
आंतरिक आलोचना
पार्टी के संगठनात्मक रिपोर्ट में एक बड़ी चिंता यह है कि पार्टी में सदस्यता में गिरावट और युवाओं का जुड़ाव घट रहा है। केरल जैसे राज्य में भी पार्टी के सदस्यता ड्रॉपआउट की दर 23 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो पूरे देश में दूसरी सबसे अधिक है। इसके अलावा, पार्टी की कार्यप्रणाली को सुधारने और नए महासचिव के चुनाव को लेकर भी प्रस्तावित सुधारों पर चर्चा की जाएगी।