भारत-चीन रिश्ते ही वैश्विक स्थिरता की गारंटी, SCO से पहले PM मोदी का जोर
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत-चीन के मजबूत रिश्ते क्षेत्रीय शांति, वैश्विक स्थिरता और आर्थिक समृद्धि के लिए अहम हैं। एससीओ बैठक में रिश्तों पर जोर रहेगा।;
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान में कहा कि चीन के साथ मजबूत संबंध “बेहद अहम” हैं, क्योंकि यह क्षेत्रीय शांति और समृद्धि पर सकारात्मक असर डाल सकते हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।
एससीओ शिखर सम्मेलन की ओर
दो दिवसीय जापान दौरा पूरा करने के बाद मोदी अब चीन के तिआनजिन जाएंगे, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस संगठन में रूस, ईरान, कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और बेलारूस भी शामिल हैं।
मोदी ने जापानी मीडिया से कहा “राष्ट्रपति शी चिनफिंग के निमंत्रण पर मैं तिआनजिन जाऊंगा। पिछले वर्ष कज़ान (रूस) में हुई SCO बैठक में मेरी राष्ट्रपति शी से मुलाकात के बाद से भारत-चीन संबंधों में स्थिर और सकारात्मक प्रगति देखी गई है। दुनिया की दो सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देशों के बीच स्थिर, अनुमानित और सौहार्दपूर्ण संबंध एशिया और पूरी दुनिया में शांति व समृद्धि के लिए बेहद अहम हैं।”
वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत-चीन नजदीकी
SCO बैठक ऐसे समय हो रही है जब भारत वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाज़ा संघर्ष और अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ लगाने से चुनौतियां और बढ़ गई हैं। अमेरिका के इस फैसले ने भारत और चीन दोनों को दशकों से चले आ रहे सैन्य तनाव को कम करने की दिशा में सोचने को मजबूर किया है।
मार्च 2025 में अमेरिका द्वारा चीनी सामान पर टैक्स लगाने के बाद चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने दिल्ली और बीजिंग से अपील की थी कि वे “हठधर्मिता और ताक़त की राजनीति का विरोध” करें। उन्होंने कहा था “हाथी और ड्रैगन को नाचाना ही एकमात्र सही विकल्प है। राष्ट्रपति शी ने बाद में इस विचार को दोहराते हुए संकेत दिया था कि बीजिंग, भारत के साथ आपसी लाभ वाले संबंधों को लेकर गंभीर है।
सहयोग का नया आयाम: ईवी सेक्टर और दुर्लभ खनिज
जापान में मोदी ने कहा “वैश्विक अर्थव्यवस्था की अस्थिरता को देखते हुए भारत और चीन का मिलकर काम करना बेहद जरूरी है ताकि विश्व आर्थिक व्यवस्था को स्थिरता मिल सके। भारत, आपसी हितों के आधार पर दीर्घकालिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से रिश्तों को आगे बढ़ाने को तैयार है।”विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) क्षेत्र और दुर्लभ खनिजों में सहयोग दोनों देशों के लिए अहम साबित हो सकता है।
जापान दौरा और प्रीफेक्चर सहयोग
शनिवार (30 अगस्त) को टोक्यो में मोदी ने जापान के 16 प्रीफेक्चरों के गवर्नरों से मुलाकात की। विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, उन्होंने भारत-जापान “विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी” के तहत राज्यों और प्रीफेक्चरों के बीच सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया।
पीएम मोदी ने कहा “आज सुबह टोक्यो में 16 प्रीफेक्चरों के गवर्नरों से मुलाकात हुई। राज्य-प्रीफेक्चर सहयोग, भारत-जापान दोस्ती का महत्वपूर्ण स्तंभ है। कल 15वें वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन के दौरान इसके लिए अलग पहल शुरू की गई थी।”
प्रधानमंत्री ने स्टार्टअप्स, तकनीक, AI, उद्यमिता और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की व्यापक संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय राज्यों की क्षमताएं और जापानी प्रीफेक्चरों की ताकत मिलकर व्यापार, कौशल, निवेश, SMEs और टेक्नोलॉजी में नए अवसर खोल सकती हैं।
युवाओं और कौशल पर जोर
मोदी ने युवाओं और कौशल विकास में साझेदारी की अपील करते हुए कहा कि जापानी तकनीक और भारतीय प्रतिभा का संगम दोनों देशों को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। MEA ने बताया कि चर्चा के दौरान व्यापार, तकनीक, पर्यटन, सुरक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।
जापानी गवर्नरों ने भी माना कि उप-राष्ट्रीय सहयोग (Sub-National Collaboration) शिक्षा, व्यापार, संस्कृति और लोगों के बीच संबंधों को नई दिशा देने में अहम साबित होगा। जापान से चीन तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया दावा कि एशिया की असली ताकत भारत-चीन साझेदारी में छिपी है", सिर्फ़ एक कूटनीतिक बयान नहीं बल्कि बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य का संकेत भी है। अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के प्रभाव घटने के बीच एशिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं भारत और चीन के रिश्ते भविष्य की शक्ति-संतुलन की दिशा तय कर सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि सीमा विवाद, रणनीतिक अविश्वास और वैश्विक गठबंधनों की खींचतान के बीच क्या यह साझेदारी वास्तव में संभव है, या फिर यह केवल एक राजनीतिक संदेश भर है?