विपक्ष शासित राज्यों की एकजुट मोर्चेबंदी, प्रस्तावित जीएसटी कटौती पर नई चुनौती

आठ राज्यों ने संभावित राजस्व नुकसान की भरपाई की माँग के लिए हाथ मिलाए;

Update: 2025-08-29 12:54 GMT
दिल्ली के कर्नाटक भवन में हुई एक बैठक में विपक्षी दलों द्वारा शासित आठ राज्यों ने 3 और 4 सितंबर को होने वाली जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक से पहले अपने राजस्व हितों की रक्षा की मांग करने का संकल्प लिया। (फाइल फोटो)

अगले हफ्ते होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक से पहले, जिसके एजेंडे में बड़े टैक्स कटौती शामिल हैं, विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने शुक्रवार (28 अगस्त) को एक साझा रणनीति बनाने का फैसला किया। इन राज्यों ने अनुमानित राजस्व हानि की भरपाई की माँग की है — जो चालू वित्त वर्ष में लगभग 50,000 करोड़ रुपये और अगले वित्त वर्ष में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये आंकी जा रही है।

बैठक और साझा बयान

दिल्ली स्थित कर्नाटक भवन में हुई बैठक में आठ राज्य सरकारों ने तय किया कि 3 और 4 सितंबर को होने वाली 56वीं जीएसटी काउंसिल बैठक में जब जीएसटी दरों में कटौती (रैशनलाइजेशन) का मुद्दा उठेगा, तब वे अपने राजस्व हितों की सुरक्षा की माँग करेंगे। इस बार जीएसटी में अब तक की सबसे बड़ी कटौती की उम्मीद है और राज्यों के राजस्व नुकसान की आशंकाएँ फिर उभर आई हैं।

जहाँ एनडीए-शासित राज्य केंद्र सरकार की रणनीति (जीएसटी दर घटाने) का समर्थन कर रहे हैं, वहीं विपक्ष शासित राज्य संभावित राजस्व हानि से जूझना नहीं चाहते। खासकर ऐसे समय में जब तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहे हैं।

साझा बयान में कहा गया कि राजस्व में कमी से सामाजिक कल्याण कार्यक्रम और विकास परियोजनाएँ बाधित हो सकती हैं। केरल जैसे राज्य लगातार चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि सितंबर में जीएसटी कटौती से उनका राजस्व घटेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में आम लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं पर जीएसटी में कटौती का वादा किया था, जिसे दिवाली से पहले लागू करने के संकेत हैं। विपक्ष शासित राज्य जीएसटी कटौती का खुला विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल पहले से मोदी सरकार पर “भारी जीएसटी बोझ” लगाने का आरोप लगाते रहे हैं। इसीलिए कोई भी पार्टी राजनीतिक रूप से उन कटौतियों का विरोध नहीं कर सकती, जो सामान और सेवाओं को सस्ता बनाएंगी।

राजस्व संरक्षण पर विपक्ष शासित राज्यों का फोकस

केंद्र सरकार ने अभी तक प्रस्तावित कटौती से राजस्व पर पड़ने वाले असर का आकलन साझा नहीं किया है। लेकिन विभिन्न संगठनों ने पूरे वित्त वर्ष में 80,000 करोड़ रुपये से लेकर 2,50,000 करोड़ रुपये तक राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया है।

विपक्ष शासित राज्यों का मानना है कि टैक्स दरों में कटौती से होने वाली संभावित खपत वृद्धि (बॉयन्सी) अल्पावधि और मध्यम अवधि में घाटे की भरपाई नहीं कर पाएगी। इसलिए वे कम से कम 5 वर्षों तक मुआवज़े की माँग कर रहे हैं — उसी तरह जैसे पहले जीएसटी कम्पेन्सेशन सेस के ज़रिए दिया गया था।

तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, केरल, हिमाचल प्रदेश और झारखंड ने संयुक्त बयान में कहा, “सभी मंत्रियों और प्रतिनिधियों ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि भारी राजस्व हानि से सामाजिक कल्याण कार्यक्रम और विकास व्यय प्रभावित होंगे। जीएसटी कटौती का फायदा उपभोक्ताओं तक पहुँचना चाहिए और इसका लाभ कंपनियों द्वारा मुनाफाखोरी में नहीं बदलना चाहिए।”

राजस्व हानि पर पुनः आशंका

बैठक में तमिलनाडु के वित्त मंत्री थंगम तेनारसु, पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा, कर्नाटक के राजस्व मंत्री कृष्णा बायरेगौड़ा, केरल के वित्त मंत्री के.एन. बालगोपाल और झारखंड के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर शामिल हुए। तेलंगाना का प्रतिनिधित्व डिप्टी सीएम मल्लु भट्टी विक्रमार्का ने किया, जबकि हिमाचल प्रदेश का प्रतिनिधित्व तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने किया। पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कहा, “सुधार की मंशा का स्वागत करते हुए हमने ज़ोर दिया कि किसी भी कटौती से राज्य की राजस्व आय को नुकसान नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसी से कल्याणकारी योजनाएँ और बुनियादी ढाँचा चलता है। हमने आग्रह किया कि दरों में कटौती का सीधा लाभ आम जनता तक पहुँचे।”

संयुक्त बयान में कहा गया, “सभी आठ राज्य केंद्र सरकार और अन्य राज्यों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जीएसटी दरों में बदलाव सभी हितधारकों के लिए लाभकारी साबित हो।”

जब जुलाई 2017 में जीएसटी लागू हुआ था, तब राज्यों से संभावित राजस्व हानि की भरपाई का वादा किया गया था और इसके लिए सेस लगाया गया था।

केंद्र और विपक्षी राज्यों की अलग-अलग चिंताएं

झारखंड के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने कहा कि भाजपा शासित राज्य भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं, लेकिन वे खुलकर बोल नहीं पा रहे। उन्होंने कहा, “संयुक्त रूप से यह निर्णय लिया गया कि जीएसटी काउंसिल की अगली बैठक के एजेंडे में इस मुद्दे को रखा जाए और सभी राज्यों तथा केंद्र सरकार से इस प्रस्ताव का समर्थन करने की अपील की जाए।”

जीएसटी काउंसिल में फैसले आम सहमति से लिए जाते हैं। यदि आठ विपक्ष शासित राज्य एक साथ मुआवज़े पर ज़ोर डालते हैं, तो प्रस्तावित जीएसटी कटौती और व्यापक सुधारों को बड़ा झटका लग सकता है।

नई जीएसटी दरें और प्रस्तावित बदलाव

अमेरिका द्वारा आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाने से भारत की आर्थिक वृद्धि पर पड़ने वाले असर को देखते हुए केंद्र सरकार का मानना है कि जीएसटी कटौती घरेलू खपत बढ़ाकर भारतीय उद्योगों को कुछ राहत दे सकती है।

प्रस्ताव के अनुसार—

* 12% और 28% स्लैब को समाप्त कर दिया जाएगा।

* रोज़मर्रा की खपत की वस्तुओं पर जीएसटी घटाकर 5% किया जाएगा।

* अन्य वस्तुओं पर 18% जीएसटी रहेगा।

* तंबाकू जैसी वस्तुओं पर नया 40% स्लैब लाने की योजना है।

* वस्त्र, फुटवियर और प्रोसेस्ड फूड जैसी चीज़ें 5% स्लैब में रखी जाएँगी।

शराब और पेट्रोलियम उत्पाद (जैसे पेट्रोल, डीज़ल, एलपीजी, केरोसीन, एटीएफ) अभी भी राज्यों के टैक्स दायरे में हैं और राजस्व घटने की आशंका के कारण इन्हें जीएसटी के तहत लाने का प्रयास सफल नहीं हुआ है।

कर्नाटक के राजस्व मंत्री कृष्णा बायरेगौड़ा ने कहा, “दरें घटाने से होने वाला 71% राजस्व नुकसान राज्यों को सहना पड़ेगा। जबकि हम दरों में तर्कसंगतता का समर्थन करते हैं, लेकिन इसका लाभ उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए, न कि उद्योग को आकस्मिक मुनाफा।”

केरल के वित्त मंत्री के.एन. बालगोपाल ने कहा, “जीएसटी लागू होने के बाद से केरल को राजस्व में भारी नुकसान हुआ है। यही स्थिति हर राज्य की है और केंद्र सरकार को हमारी अपील पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।”


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