बंगाल के समंदर पर कैसे चलता था 'छोट' नाव का राज?
आज समुद्र में नावें कम ही दिखाई देती हैं, लेकिन कभी बंगाल के आसपास के समुद्री जल में कभी उनका राज चलता था। 'छोट' पानी को चीरकर तेजी से आगे बढ़ने में सक्षम थी;
अंग्रेजी के वी-आकार की इस छोट नाव को पानी पर आसानी से टिकाया जा सकता था, और यह लहरों को चीरते हुए तेज़ी से आगे बढ़ सकती थी। समय के साथ, 'छोट' जल से बाहर हो गई, लेकिन इसे भारत के समुद्री इतिहास के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में पुनर्जीवित किया जा रहा है।
ब्रिटेन के 'एंडेंजर्ड मटेरियल नॉलेज प्रोग्राम' (EMKP) और ब्रिटिश म्यूजियम के सहयोग से इस पुरानी शैली की नाव का निर्माण हावड़ा के श्यामपुर स्थित दिइमंडल घाट में कई महीनों में किया गया। इसे गुजरात के लोथल में बन रहे राष्ट्रीय समुद्री विरासत संग्रहालय में स्थानांतरित किया जाएगा। यह संग्रहालय, जो बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय के अंतर्गत आता है, भारत के 5000 साल पुराने समुद्री इतिहास को दर्शाने का लक्ष्य रखता है।
कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह पर 'छोट' नाव
इस बीच, इस नाव के निर्माण प्रक्रिया पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री ब्रिटिश म्यूजियम की वेबसाइट (एशिया सेक्शन) पर उपलब्ध है। इस परियोजना की देखरेख समुद्री मानवविज्ञानी जॉन पी. कूपर, जीशान अली शेख (एक्सेटर विश्वविद्यालय) और कोलकाता के स्वरूप भट्टाचार्य, जो नदी और समुद्री संस्कृति में विशेष रुचि रखने वाले सामाजिक मानवविज्ञानी हैं, कर रहे थे।
श्यामपुर क्षेत्र में नाव निर्माताओं का समुदाय मौजूद है, लेकिन लंबे समय से लुप्त 'छोट' नाव की जानकारी रखने वाला कोई व्यक्ति खोजना कठिन कार्य था। सौभाग्य से, परियोजना दल को पंचानन मंडल मिले, जिनके पूर्वजों से नाव बनाने की परंपरागत कला विरासत में मिली थी।
उनके 70 वर्षीय पिता अब शारीरिक रूप से नाव निर्माण में भाग लेने में असमर्थ थे, लेकिन उन्होंने निर्माण प्रक्रिया के बारीकियों को समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके 40 वर्षीय पुत्र अमोल मंडल ने इस प्रोटोटाइप के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई और इसे "एक नया अनुभव और खोई हुई कला को पुनः खोजने" जैसा बताया।
भट्टाचार्य बताते हैं कि 'छोट' बंगाल की एकमात्र समुद्री नाव थी, जो समुद्र में लहरों का सामना कर सकती थी और मुख्यतः मालवाहन के लिए उपयोग की जाती थी। इसकी वी-आकार की संरचना इसे पानी पर आसानी से टिकने में मदद करती थी और साथ ही इसे काटकर आगे बढ़ने में सक्षम बनाती थी।
बंगाल का समुद्री अतीत और 'छोट' की ऐतिहासिक प्रासंगिकता
भारत प्राचीन काल से एक समुद्री राष्ट्र रहा है। बंगाल में ताम्रलिप्त (आज का तमलुक), जो रूपनारायण नदी के तट पर स्थित था और बंगाल की खाड़ी से जुड़ता था, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के समय से एक प्रमुख बंदरगाह रहा है। यह वह स्थान था, जहाँ से बौद्ध भिक्षु दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीलंका और अन्य क्षेत्रों में बुद्ध के संदेश का प्रचार करने के लिए नौकायन करते थे।
बाद में, रूपनारायण नदी के प्रवाह परिवर्तन के कारण ताम्रलिप्त बंदरगाह ने अपना महत्व खो दिया, लेकिन खुदाई के दौरान अब भी रोमन काल के अवशेष मिलते हैं, जो इसकी ऐतिहासिक भूमिका को प्रमाणित करते हैं।
कोलकाता में बोट म्यूजियम और नावों की विविधता
भट्टाचार्य कोलकाता के काकुड़गाछी में स्थित 'बोट म्यूजियम' से भी जुड़े हुए हैं, जिसे पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री उपेन विश्वास की पहल पर स्थापित किया गया था। यहाँ 46 विभिन्न प्रकार की स्थानीय नावों के लघु मॉडलों का प्रदर्शन किया गया है। इनमें 18वीं सदी के औपनिवेशिक काल के स्केच से प्रेरित कुछ विलुप्त नावों के मॉडल भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए, 'पिनेस' नाव एक 18वीं सदी के स्केच से प्रेरित है।
यह संग्रहालय दर्शाता है कि कैसे बंगाल की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार की नावों का निर्माण किया गया था। जैसे, उत्तर बंगाल की तेज़ नदी धाराओं के लिए 'कोसा' नाव, धीमी गति से बहने वाली हुगली नदी के लिए 'डिंगी' और बड़े पैमाने पर घास ले जाने के लिए चौड़ी, समतल-तली 'खोरोकिस्ती' नाव। 'मसूला' नाव आज भी ओडिशा और तमिलनाडु के तटों पर मछली पकड़ने के लिए उपयोग की जाती है।
बालागढ़ की नाव निर्माण परंपरा और GI टैग का प्रयास
बंगाल में नाव निर्माण की एक और प्रमुख परंपरा हावड़ा जिले के बालागढ़ में देखी जाती है, जहाँ 16वीं शताब्दी में नाव निर्माण उद्योग फला-फूला था। यहाँ के नाव निर्माता 'जोड़-पद्धति' का उपयोग करते हैं, जिसमें लकड़ी के तख्तों को बिना कील के जोड़कर नाव बनाई जाती है। यह अनूठी तकनीक बंगाल में कहीं और नहीं पाई जाती।
बालागढ़ क्षेत्र कभी सप्तग्राम बंदरगाह का हिस्सा था, जहाँ से पुर्तगाली व्यापारी 18वीं शताब्दी में व्यापार के लिए आए थे। यहाँ तक कि पुर्तगाली समुद्री डाकू भी 1795-1845 के बीच बालागढ़ निर्मित नावों का उपयोग करते थे। परंतु सरस्वती नदी के सूख जाने से सप्तग्राम बंदरगाह का महत्व कम हो गया।
बालागढ़ की नाव निर्माण परंपरा को पहचान दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (WBNUJS) ने इस उद्योग को भौगोलिक संकेत (GI) टैग दिलाने का प्रस्ताव दिया है, जो इस वर्ष की सूची में विचाराधीन है। स्थानीय इतिहास पर शोध करने वाले प्रोफेसर पार्थ चट्टोपाध्याय, जिन्होंने 'हुगली जिले की नौका निर्माण परंपरा' नामक पुस्तक लिखी है, इस प्रयास में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
नावों के महत्व और भविष्य की संभावनाएँ
भट्टाचार्य बताते हैं कि नावें मानव सभ्यता और प्रवासन से गहराई से जुड़ी रही हैं, और जब तक नदियाँ रहेंगी, नावों का अस्तित्व बना रहेगा। आज भी, बंगाल में बाढ़ के समय पारंपरिक नावें जीवन रक्षक साबित होती हैं।
उन्होंने इस सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, "यह हमारी विरासत, हमारी संस्कृति और हमारी व्यापारिक परंपरा है, जिसे हमें भूलना नहीं चाहिए, बल्कि संरक्षित करना चाहिए।"